शुक्रवार, 13 मार्च 2015

हिंदी गोष्ठी

हिंदुस्तानी प्रचार सभा में हिंदी गोष्ठी हो रही है 

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल, वर्धा

कुछ ठग अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बच्चों को वजीफा दिलाने के बहाने सरकारी तिजोरी से कई हजार करोड़ रुपये इसलिए निकालने में सफल हो गए, क्योंकि वजीफा देने से पहले जिन कागजातों के वेरिफकेशन की जरूरत थी, वे वेरिफाई किए ही नहीं गए। गडचिरौली पुलिस ने इस केस में अब तक पांच लोगों को गिरफ्तार किया है, पर विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि इस केस में आदिवासी प्रकल्प व समाज कल्याण विभाग के ही कम से कम 100 सरकारी कर्मचारी व अधिकारी भी पुलिस जांच से बच नहीं सकते।
टेक्निकल कोर्स के बहाने हुए इस एजुकेशन घोटाले की शुरूआत सन 2010-11 से हुई। उस साल राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, ज्ञान मंडल, वर्धा वालों ने पूरे महाराष्ट्र के 28 जिलों में 36 स्टडी सेंटर खोले थे। स्टडी सेंटर की यह संख्या सन 2011-12 में बढ़कर 111, जबकि सन 2012-13 में 252 हो गई। सबसे ज्यादा 24 स्टडी सेंटर नागपुर में खोले गए। धुले व जलगांव में इनकी संख्या 21 रखी गई, जबकि बुलढाना व चंद्रपुर में 20-20 स्टडी सेंटर बनाए गए। आकोला में 15 और अमरावती में भी 19 स्टडी सेंटर अस्तित्व में दिखाए गए। कई छोटे शहरों में 10 से कम भी स्टडी सेंटर खोले गए।

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, ज्ञान मंडल, वर्धा वालों ने गडचिरौली पुलिस से जो दावा किया, उसके मुताबिक, चूंकि सन 2013 -14 के टेक्निकल कोर्स के लिए उन्हें बहुत देर से परमिशन मिली थी, इसलिए उन्होंने न तो किसी बच्चे को इस साल किसी भी स्टडी सेंटर में इनरोल किया और न ही उनकी परीक्षा ली गई, पर एनबीटी को विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि सन 2013-14 में 9 हजार से ज्यादा बच्चों के नाम पर करोड़ों रुपये निकाल लिए गए।
एक सूत्र के अनुसार, महाराष्ट्र में 29 ट्राइबल प्रॉजेक्ट हैं। सन 2013-14 में इन 29 में से 15 ट्राइबल प्रॉजेक्ट के तहत 89 स्टडी सेंटर में 5483 बच्चों को इनरोल किया गया और आदिवासी प्रकल्प विभाग की तरफ से 2282 बच्चों को कागज पर स्कॉलरशिप दी गई दिखाई गई। इसी तरह समाज कल्याण विभाग के दायरे में आने वाले 13 जिलों के 113 स्टडी सेंटर में 11 हजार 273 बच्चों को इनरोल किया गया और 6925 बच्चों को स्कॉलरशिप दिए जाने के फर्जी कागज तैयार किए गए। यदि कुल हिसाब को देखें, तो सन 2013-14 में कुल 202 स्टडी सेंटरों में 16 हजार 756 बच्चों का प्रवेश दिखाया गया और दावा किया गया कि 9207 बच्चों के नाम पर स्कॉलरशिप के बहाने करोड़ों रुपया हड़प लिया गया। अलग-अलग कोर्स की अलग-अलग फीस होती है, जो न्यूनतम 19 हजार 700 रुपये से शुरू होकर अधिकतम 49 हजार 500 तक बैठती है।
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल, वर्धा का कहना है कि उन्होंने सन 2013-14 में जब किसी भी स्टडी सेंटर में किसी भी स्टूडेंट को इनरोल ही नहीं किया, तो सवाल यह है कि 16 हजार 756 बच्चों को ऐडमिशन किसने दिया और फिर 9207 बच्चों की स्कॉलरशिप किस आधार पर आदिवासी प्रकल्प विभाग व समाज कल्याण विभाग से निकाली गई। ये स्कॉलरशिप दोनों ही सरकारी विभागों की महाराष्ट्र की 28 ब्रांच से बांटी गई। नियम यह है कि कोई भी स्कॉलरशिप देने से पहले उससे जुड़े कागजातों का वेरिफकेशन होना चाहिए। चूंकि ऐसा हुआ नहीं, इसलिए साफ है कि इन 28 ब्रांच में बैठे सरकारी कर्मचारी इस घोटाले में गले-गले तक शामिल थे।
एक अधिकारी का कहना है कि यदि हर ब्रांच से 4 सरकारी कर्मचारियों को इस घोटाले के लिए जिम्मेदार माना जाए, तो यह संख्या 100 से ऊपर पहुंचती है। चूंकि स्कॉलरशिप की यह राशि केंद्र सरकार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बच्चों को राज्य सरकार के मार्फत भेजती है, इसलिए सुपरवाइज अथॉरिटी होने के नाते इन दोनों सरकारी विभागों से जुड़े बड़े अधिकारी, यहां तक पूर्व मंत्री भी अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते। इसलिए आने वाले दिनों में पुलिस इन सभी लोगों का स्टेटमेंट लेने वाली है और संभव है कई को सलाखों के पीछे भी पहुंचा दे। महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि उन्होंने बच्चों को ऑनइलाइन स्कॉलरशिप दी और ठगों ने उसे बहुत चतुराई से ठग लिया। पर सवाल यह है कि ऑनलाइन स्कॉलरशिप बच्चों के अकांउट में सीधे जानी चाहिए थी। चूंकि ऐसा हुआ नहीं, तो इसका जिम्मेदार कौन है।

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति को पुलिस ने भेजा नोटिस

करोड़ों रुपये के एजुकेशन घोटाले में जांच के घेरे में आई राष्ट्रभाषा प्रचार समिति को पुलिस ने नोटिस भेजा है। गड़चिरौली क्राइम ब्रांच के प्रभारी इंस्पेक्टर रवींद्र पाटील ने सोमवार को एनबीटी को यह जानकारी दी। श्री पाटील ने कहा कि उनकी अब तक की जांच में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से जुड़े लोगों की भूमिका सवालों के घेरे में है इसलिए पुलिस ने इस केस ने उन्हें नोटिस भेजा है। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से जुड़े जिम्मेदार लोगों के खिलाफ पुलिस का ऐक्शन उनसे आगे की पूछताछ के बाद लिया जाएगा।
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति पर पुलिस का आरोप है कि उसने यूजीसी से जिन टेक्निकल कोर्स की परमिशन पांच साल के लिए मांगी थी, उनकी फ्रेंजाइजी उसने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल को दे दी थी। ऐसा करना अवैध है। पुलिस राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के पदाधिकारियों के अलावा ज्ञान मंडल और इंडियन नॉलेज कार्पोरेशन के कुछ लोगों से भी पूछताछ करनेवाली है। इस केस में अब तक पुलिस पांच लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है। रवींद्र पाटील के अनुसार, कुछ और अहम गिरफ्तारियों के लिए महाराष्ट्र के अलग-अलग शहरों में पुलिस की टीमें भेजी गई हैं।

पुलिस की जांच में अब तक एक पूर्व मंत्री और एक पॉवरफुल महिला के बेहद करीबी व्यक्ति का नाम भी सामने आया है, पर गडचिरौली पुलिस ने अभी इस बारे में पत्ते नहीं खोले हैं कि इन लोगों से वह कब पूछताछ करेगी। कई लोगों का मानना है कि राज्य सरकार संभव है यह केस स्टेट सीआईडी को ट्रांसफर कर दे।

शनिवार, 31 जनवरी 2015

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में 10 हजार करोड़ का शिक्षा घोटाला

महाराष्ट्र में अब तक का सबसे बड़ा एजुकेशन घोटाला सामने आया है। करीब दस हजार करोड़ रुपये के इस घोटाले में अब तक पांच लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इस केस में महाराष्ट्र के एक पूर्व मंत्री भी जांच के दायरे में हैं। इस घोटाले में महाराष्ट्र सरकार के दो विभागों के खजाने से प्रति स्टूडेंट के नाम पर 48 हजार रुपये निकाल लिए गए पर इन स्टूडेंट्स को खुद पता नहीं कि वे किस कॉलेज में पढ़ते हैं।
गढ़चिरौली के स्पेशल क्राइम ब्रांच यूनिट के इंस्पेक्टर रवींद्र पाटील ने शुक्रवार को एनबीटी को विस्तार से इस घोटाले की जानकारी दी। श्री पाटील के अनुसार, वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति है जिसकी स्थापना महात्मा गांधी ने की थी। महाराष्ट्र की एक पावरफुल महिला के एक बेहद करीबी ने इंडिया नॉलेज कॉर्पोरेशन और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के बीच एक अग्रीमेंट करवाया। इस अग्रीमेंट के बाद एक नई समिति का गठन हुआ जिसका नाम रखा गया- राष्ट्र भाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल।
महाराष्ट्र में अब तक का सबसे बड़ा एजुकेशन घोटाला सामने आया है। करीब दस हजार करोड़ रुपये के इस घोटाले में अब तक पांच लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इस केस में महाराष्ट्र के एक पूर्व मंत्री भी जांच के दायरे में हैं। इस घोटाले में महाराष्ट्र सरकार के दो विभागों के खजाने से प्रति स्टूडेंट के नाम पर 48 हजार रुपये निकाल लिए गए पर इन स्टूडेंट्स को खुद पता नहीं कि वे किस कॉलेज में पढ़ते हैं।
गढ़चिरौली के स्पेशल क्राइम ब्रांच यूनिट के इंस्पेक्टर रवींद्र पाटील ने शुक्रवार को एनबीटी को विस्तार से इस घोटाले की जानकारी दी। श्री पाटील के अनुसार, वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति है जिसकी स्थापना महात्मा गांधी ने की थी। महाराष्ट्र की एक पावरफुल महिला के एक बेहद करीबी ने इंडिया नॉलेज कॉर्पोरेशन और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के बीच एक अग्रीमेंट करवाया। इस अग्रीमेंट के बाद एक नई समिति का गठन हुआ जिसका नाम रखा गया- राष्ट्र भाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल।
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ने यूजीसी से पांच टेक्निकल कोर्सज की डिस्टेंश एजुकेशन की परमिशन मांगी। यूजीसी ने पांच साल के लिए यह परमिशन दे भी दी। परमिशन के तहत ये कोर्स राष्ट्रभाषा प्रचार समिति को शुरू करवाने थे पर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ने यह अधिकार अपनी मर्जी से राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल को दे दिया।
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल ने इसके लिए कागज पर पूरे महाराष्ट्र में 262 स्टडी सेंटर दिखाए। यूजीसी परमिशन के तहत एक स्टडी सेंटर अपने सेंटर में एक कोर्स के लिए अधिकतम 60 स्टूडेंट्स रख सकता था। इस तरह हर सेंटर में अधिकतम 300 स्टूडेंट्स होने चाहिए थे पर कई स्टडी सेंटर ने अपने यहां एसटी, एससी, ओबीसी व ऐंटी टीडी आरक्षण के तहत 600-600 स्टूडेंट्स तक रेकॉर्ड में दिखाए। हालांकि हकीकत में एक भी स्टूडेंट नहीं था। यहां तक कि किसी भी स्टडी सेंटर के लिए कॉलेज जैसा कोई परिसर भी नहीं था। अलबत्ता, किसी भी हाउसिंग सोसाइटी में छोटे-छोटे एक या दो घर ले लिए गए थे जहां एक-दो चपरासी और चंद अन्य लोग रखे गए थे।
हर टेक्निकल कोर्स की फीस प्रति स्टूडेंट प्रति साल 48 हजार रुपये थी पर इस स्टडी सेंटर में आरक्षित श्रेणी के स्टूडेंट की पूरी फीस सरकार को भरनी थी। एसटी श्रेणी के स्टूडेंट की फीस भरने का यह जिम्मा महाराष्ट्र सरकार के विभाग अकादमिक आदिवासी विकास प्रकल्प कार्यालय के पास था जबकि एसटी को छोड़कर शेष एससी, ओबीसी व ऐंटि टीडी आरक्षित श्रेणियों के स्टूडेंट की फीस समाज कल्याण विभाग को देनी होती है।
इस 48 हजार रुपये में 2300 रुपये की रकम सीधे स्टूडेंट के अकाउंट में, 9,000 रुपये राष्ट्रभाषा प्रचार समित ज्ञान मंडल के अकाउंट में जबकि शेष करीब 35 हजार रुपये की रकम स्टडी सेंटर के अकाउंट में ट्रासंफर होनी थी। यह सारी रकम दोनों सरकारी विभागों से ट्रांसफर हुई भी पर हकीकत यह है कि इन किसी भी 262 स्टडी सेंटर में कोई भी स्टूडेंट पिछले पांच साल में कभी पढ़ा ही नहीं।
तो यह रकम सरकार से ली कैसे गई? इंस्पेक्टर रवींद्र पाटील ने एनबीटी को बताया कि राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल के लोगों ने पूरे महाराष्ट्र में अपने एजेंट गांव गांव में भेजे। इन एजेंटों ने आरक्षित श्रेणी के लोगों से किसी सरकारी स्कीम के बहाने जरूरी दस्तोवज लिए और फिर उनकी झेराक्स करवाकर दोनों सरकारी विभागों अकादमिक आदिवासी विकास कार्यालय व समाज कल्याण विभाग को भेज दिए। फिर इन दस्तावेजों के आधार पर इन दोनों सरकारी विभागों से रकम रिलीज की जाती रही।
यदि कायदे से देखा जाए तो इस घोटाले में सिर्फ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल ही आरोपी माना चाहिए पर हकीकत में दोनों सरकारी विभाग भी उतने ही दोषी हैं। इसकी वजह है स्टूडेंट के अकाउंट नंबर जिसमें प्रति स्टूडेंट 2300 रुपये जमा होने थे। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल वालों ने दोनों सरकारी विभागों को स्टूडेंट के जो बैंक अकाउंट नंबर दिए, वे सब अंदाज से दिए नंबर थे जिनके आखिरी अंक 11-11 या 12-12 से खत्म होते थे।
जब इन अकाउंट में चेक भेजे गए तो स्वाभाविक है वे रिटर्न हो गए। रिटर्न होकर ये चेक आए इन दो सरकारी विभागों में ही, जहां से ये जारी किए गए थे। ऐसे में इन सरकारी विभागों के कुछ क्लर्कों ने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल के लोगों से कुछ फर्जी अकाउंट खुलवाए और फिर उसमें यह रकम ट्रांसफर की गई। इंस्पेक्टर रवींद्र पाटील के अनुसार, यदि पिछले 5 साल से सभी 262 सेंटर का पूरा हिसाब लगाया जाए और इन 262 सेंटरों के 600 स्टूडेंट्स के नाम पर प्रति स्टूडेंट 48 हजार रुपये का पूरा गुणा किया जाए तो यह घोटाला कई कई हजार हजार करोड़ रुपये का बैठता है।
अकादमिक आदिवासी विकास कार्यालय व समाज कल्याण विभाग पूर्व में जिस मंत्री के अंडर में आते हैं, जांच चल रही है कि कहीं उनकी तो इस घोटाले में कोई भूमिका तो नहीं थी। उम्मीद की जा रही है कि नई सरकार यह केस स्टेट सीआईडी को ट्रांसफर कर सकती है। पूर्व मंत्री, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल से जुड़े बड़े लोगों और महाराष्ट्र की एक पॉवरफुल महिला व उसके करीबी से पूछताछ उसी के बाद होने की संभावना है। ने यूजीसी से पांच टेक्निकल कोर्सज की डिस्टेंश एजुकेशन की परमिशन मांगी। यूजीसी ने पांच साल के लिए यह परमिशन दे भी दी। परमिशन के तहत ये कोर्स राष्ट्रभाषा प्रचार समिति को शुरू करवाने थे पर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ने यह अधिकार अपनी मर्जी से राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल को दे दिया।
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल ने इसके लिए कागज पर पूरे महाराष्ट्र में 262 स्टडी सेंटर दिखाए। यूजीसी परमिशन के तहत एक स्टडी सेंटर अपने सेंटर में एक कोर्स के लिए अधिकतम 60 स्टूडेंट्स रख सकता था। इस तरह हर सेंटर में अधिकतम 300 स्टूडेंट्स होने चाहिए थे पर कई स्टडी सेंटर ने अपने यहां एसटी, एससी, ओबीसी व ऐंटी टीडी आरक्षण के तहत 600-600 स्टूडेंट्स तक रेकॉर्ड में दिखाए। हालांकि हकीकत में एक भी स्टूडेंट नहीं था। यहां तक कि किसी भी स्टडी सेंटर के लिए कॉलेज जैसा कोई परिसर भी नहीं था। अलबत्ता, किसी भी हाउसिंग सोसाइटी में छोटे-छोटे एक या दो घर ले लिए गए थे जहां एक-दो चपरासी और चंद अन्य लोग रखे गए थे।
हर टेक्निकल कोर्स की फीस प्रति स्टूडेंट प्रति साल 48 हजार रुपये थी पर इस स्टडी सेंटर में आरक्षित श्रेणी के स्टूडेंट की पूरी फीस सरकार को भरनी थी। एसटी श्रेणी के स्टूडेंट की फीस भरने का यह जिम्मा महाराष्ट्र सरकार के विभाग अकादमिक आदिवासी विकास प्रकल्प कार्यालय के पास था जबकि एसटी को छोड़कर शेष एससी, ओबीसी व ऐंटि टीडी आरक्षित श्रेणियों के स्टूडेंट की फीस समाज कल्याण विभाग को देनी होती है।
इस 48 हजार रुपये में 2300 रुपये की रकम सीधे स्टूडेंट के अकाउंट में, 9,000 रुपये राष्ट्रभाषा प्रचार समित ज्ञान मंडल के अकाउंट में जबकि शेष करीब 35 हजार रुपये की रकम स्टडी सेंटर के अकाउंट में ट्रासंफर होनी थी। यह सारी रकम दोनों सरकारी विभागों से ट्रांसफर हुई भी पर हकीकत यह है कि इन किसी भी 262 स्टडी सेंटर में कोई भी स्टूडेंट पिछले पांच साल में कभी पढ़ा ही नहीं।
तो यह रकम सरकार से ली कैसे गई? इंस्पेक्टर रवींद्र पाटील ने एनबीटी को बताया कि राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल के लोगों ने पूरे महाराष्ट्र में अपने एजेंट गांव गांव में भेजे। इन एजेंटों ने आरक्षित श्रेणी के लोगों से किसी सरकारी स्कीम के बहाने जरूरी दस्तोवज लिए और फिर उनकी झेराक्स करवाकर दोनों सरकारी विभागों अकादमिक आदिवासी विकास कार्यालय व समाज कल्याण विभाग को भेज दिए। फिर इन दस्तावेजों के आधार पर इन दोनों सरकारी विभागों से रकम रिलीज की जाती रही।
यदि कायदे से देखा जाए तो इस घोटाले में सिर्फ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल ही आरोपी माना चाहिए पर हकीकत में दोनों सरकारी विभाग भी उतने ही दोषी हैं। इसकी वजह है स्टूडेंट के अकाउंट नंबर जिसमें प्रति स्टूडेंट 2300 रुपये जमा होने थे। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल वालों ने दोनों सरकारी विभागों को स्टूडेंट के जो बैंक अकाउंट नंबर दिए, वे सब अंदाज से दिए नंबर थे जिनके आखिरी अंक 11-11 या 12-12 से खत्म होते थे।
जब इन अकाउंट में चेक भेजे गए तो स्वाभाविक है वे रिटर्न हो गए। रिटर्न होकर ये चेक आए इन दो सरकारी विभागों में ही, जहां से ये जारी किए गए थे। ऐसे में इन सरकारी विभागों के कुछ क्लर्कों ने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल के लोगों से कुछ फर्जी अकाउंट खुलवाए और फिर उसमें यह रकम ट्रांसफर की गई। इंस्पेक्टर रवींद्र पाटील के अनुसार, यदि पिछले 5 साल से सभी 262 सेंटर का पूरा हिसाब लगाया जाए और इन 262 सेंटरों के 600 स्टूडेंट्स के नाम पर प्रति स्टूडेंट 48 हजार रुपये का पूरा गुणा किया जाए तो यह घोटाला कई कई हजार हजार करोड़ रुपये का बैठता है।

अकादमिक आदिवासी विकास कार्यालय व समाज कल्याण विभाग पूर्व में जिस मंत्री के अंडर में आते हैं, जांच चल रही है कि कहीं उनकी तो इस घोटाले में कोई भूमिका तो नहीं थी। उम्मीद की जा रही है कि नई सरकार यह केस स्टेट सीआईडी को ट्रांसफर कर सकती है। पूर्व मंत्री, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल से जुड़े बड़े लोगों और महाराष्ट्र की एक पॉवरफुल महिला व उसके करीबी से पूछताछ उसी के बाद होने की संभावना है।

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

शुभकामनाएं

साथियों ,

मेरी और मेरी धर्म-पत्नी की ओर से आपको तथा आपके परिवार को नव वर्ष 2015 की हार्दिक शुभकामनाएं । 

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

हिंदी के कारण 4 साल लटकी रही ऑडिट रिपोर्ट

उत्तरप्रदेश के  पंचायती राज विभाग की ऑडिट रिपोर्ट प्रदेश सरकार चार साल तक सदन में पेश नहीं कर पाई। वर्ष 2010-11 की ऑडिट रिपोर्ट सरकार ने बुधवार को विधान परिषद में पेश की।
सरकार ने खुद माना है कि यह रिपोर्ट विलंब से पेश की गई लेकिन इसकी जो वजह बताई वह सदन में विपक्ष को गले नहीं उतरी। सरकार ने कहा है कि इसकी यथोचित प्रतियां हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि में प्राप्त करने में विलंब हुआ।
विधान परिषद में प्रदेश सरकार ने पंचायती राज संस्थाओं की तकनीकी ऑडिट रिपोर्ट और पंचायती राज एवं सहकारी समितियों का बजट ऑडिट पेश किया। मुख्य लेखा परीक्षा अधिकारी सहकारी समितियां और पंचायतें उत्तर प्रदेश की इस रिपोर्ट को पेश करने के दौरान ही सरकार ने लिखित में माना है कि 2010-11 की यह रिपोर्ट विलंब के कारणों सहित पेश की जा रही है।
सदस्यों को इसके कारण भी लिखित तौर पर बताए गए। इसमें लिखा है कि हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि में उपलब्ध न होने के कारण विलंब हुआ। इस पर बीजेपी विधान परिषद दल के नेता ने सवाल उठाया कि क्या विभाग में पूरा काम अंग्रेजी में होता है?
विभाग में लोग हिंदी नहीं जानते और क्या कोई अनुवादक भी नहीं है। इस पर सरकार की ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिल सका और कहा गया कि कारणों सहित रिपोर्ट पेश कर दी गई है।

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

शुभेच्छा

सभी पाठकों को दीपावली की हार्दिक शुभेच्छा ।


(डॉ. राजेन्द्र कुमार गुप्ता)