गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

अच्छे भारतीय बनाना है तो अँग्रेजी सीखना आवश्यक



अच्छे भारतीय बनाना है तो अँग्रेजी सीखना आवश्यक है । आज रिक्शे वाला या मजदूर भी पैसा पैसा जोड़कर अपने बच्चों को इंगलिश मीडियम स्कूल में भेजता है । यह एक सच्चाई है । एक नेता ने राजनीति में अपने प्रदेश में बच्चों को हिन्दी पढ़ने का पाठ पढ़ाया लेकिन अपने बच्चे को दूसरे प्रदेश में इंगलिश मीडियम स्कूल में दाखिल कराया । यह बात हमने नहीं , बल्कि मानव संसाधन मंत्री शशि थरूर ने एक  टेलेविजन इंटरव्यू  में कही है । देश को ऐसे नेताओं के बारे में भी सोचना चाहिए । 

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

बेहतरीन नाटककार से इतर उनका एक दूसरा पहलू भी था


 अब अगर इस हालिया स्टडी की मानें तो जाने-माने नाटककार विलियम शेक्सपियर टैक्स चोरी करते थे और ब्लैक मार्केटिंग से भी जुड़े थे। खाने-पीने की कमी के दिनों में वह गैर कानूनी तरीके से खाने-पीने की वस्तुओं की जमाखोरी करते थे। इतना ही नहीं, टैक्स चोरी के आरोप में भी वह जेल जाते हुए बाल-बाल बचे।

आबारेटस्टविथ यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स द्वारा हाल ही में करवाई गई स्टडी में यह बात सामने आई है। शेक्सपियर के चाहने वालों के लिए यह भले ही चौंकाऊ खबर हो लेकिन स्टडी में शामिल जेनी आर्कर का कहना है कि बेहतरीन नाटककार से इतर उनका एक दूसरा पहलू भी था। वह एक क्रूर बिजनसमैन थे, जो अपना प्रॉफिट बढ़ाने के लिए दूसरों के हक हलाल करने से भी नहीं चूकते थे। टैक्स बचाने और कमजोर आदमी का लाभ भी वह उठाते थे।

संडे टाइम्स में छपी इस रिपोर्ट के मुताबिक, जिस समय यूरोप में खाने के लाले पड़े हुए थे, उस समय शेक्सपियर के निर्दयी बिजनसमैन वाला व्यक्तित्व सामने आया। जेनी आर्कर ने यह स्टडी यूनिवर्सिटी के हॉवर्ड थॉमस और रिचर्ड टर्ले के साथ मिलकर की है।

टीम को शेक्सपियर के टैक्स और अन्य कागजात कोर्ट से मिले जिनसे पता चला कि वह कई बार कोर्ट में घसीटे गए। उन्हें कई बार गैर कानूनी तौर पर खाने पीने के सामान की जमाखोरी के लिए जुर्माना देना पड़ा। उन्हें टैक्स चोरी के लिए जेल जाने की चेतावनी भी देनी पड़ी। अपनी ऐसी ही गैर कानूनी गतिविधियों के चलते वह 1613 में रिटायरमेंट के वक्त अपने होम टाउन, स्ट्रैटफोर्ट, के सबसे बड़े प्रॉपर्टी ओनर थे।

बुधवार, 27 मार्च 2013

जब पढाई में होशियार छात्र का ये हाल है तो कमजोर छात्रों की क्या गत बनती होगी


राष्ट्रिय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् NCERT ने सीबीएससी की बारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों को अंग्रेजी विषय में साहित्य पढ़ाने के लिए अंग्रेजी विषय की दो पुस्तकें प्रकाशित कर लागू कर रखी है| पहली पुस्तक Flamingo Textbook in English- X11 Core Course. इस पुस्तक में छात्रों को पढ़ाने के लिए राष्ट्रिय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् ने जो कहानियां व कविताएँ प्रकाशित की है उनके लेखकों में महज दो नामों Ashoka Mitram & Kamala Dasss को छोड़कर बाकी सभी नाम Alphonse, Anees Jung, William Dougals, Selma Langerdof, Louis Fischer, Christopher, A.R.Bartor, Stephen Spender, Pablo Neruda, Jhon Keats, Robert Frost, Adrienne Rich विदेशी है| और इनकी रचनाओं से भारत का व भारतीय इतिहास, संस्कृति या किसी भारतीय विषय से कोई लेना देना नहीं है| 

हाँ इनमें से एक विदेशी लेखक (Louis Fischer) का लेख “Indigo” जरुर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर है जिसे पढने या पुस्तक में देखने के बाद लगता है कि राष्ट्रिय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् को पुस्तक में महात्मा गाँधी के बारे में छापने के लिए भी किसी भारतीय का लिखा मिला ही नहीं या फिर राष्ट्रिय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् किसी भारतीय लेखक द्वारा लिखा छात्रों को पढ़ाने लायक नहीं समझती|

बारहवीं कक्षा की ही दूसरी पुस्तक “Vistas” Strictly Based on Latest Style and syllabus of NCERT में भी राष्ट्रिय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् राष्ट्रिय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् ने भारतीय छात्रों को पढ़ाने के लिए विदेशी लेखकों की ही रचनाएँ चुनी है ये विदेशी लेखक है - Jack Finney, Kalki, Tishani Doshi, John Updike, Colin Dixter, Zitkala SA, Bama |

इन पुस्तकों में प्रकाशित विदेशी रचनाओं को ज्यादातर छात्र समझ ही नहीं पाते कि ये उन्हें पढाई किस उद्देश्य से जा रही है? बारहवीं कक्षा का एक पढाई में अव्वल आने वाले होशियार छात्र ने बताया कि उसने पुस्तक में विदेशी लेखकों द्वारा लिखी कहानियों को समझने के लिए तीन अलग-अलग रेफरेंस बुक खरीदकर पढ़ी फिर भी मैं उन कहानियों को समझ नहीं पाया| जब पढाई में होशियार छात्र का ये हाल है तो कमजोर छात्रों की क्या गत बनती होगी आसानी से समझी जा सकती है|

उपरोक्त दोनों पुस्तकों के में राष्ट्रिय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् द्वारा चुने गए अंग्रेजी साहित्य व उनके लेखकों के बारे में चर्चा करते हुए एक छात्र चुटकी लेता है कि यदि राष्ट्रिय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् को हमारी हिंदी विषय की पुस्तक के लिए भी यदि विदेशी लेखक और उनका लिखा मिल जाता तो वो भी हमें विदेशियों का विदेश के बारे में लिखा ही पढना पड़ता|

राष्ट्रिय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् द्वारा बारहवीं कक्षा के छात्रों को पढने के लिए उपरोक्त दोनों पुस्तकों को देखने के बाद मन में कई प्रश्न उठ खड़े होते है-

1- क्या भारत में अंग्रेजी साहित्यकार पैदा ही नहीं हुए?

2- क्या भारत के अंग्रेजी साहित्यकारों द्वारा लिखा साहित्य राष्ट्रिय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् निम्न स्तर का समझती है ?

3- क्या भारतीय संस्कृति, इतिहास व साहित्य अंग्रेजी में लिखा ही नहीं गया ? कि भारतीय छात्रों को विदेशी साहित्य पढाया जा रहा है|

4- क्या राष्ट्रिय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् छात्रों को पढ़ाने के लिए कोर्स में भारतीय महापुरुषों की जीवनियाँ आदि शामिल नहीं कर सकती ? जिन्हें पढ़ भारतीय छात्र गौरान्वित हो सके|
 

5 - क्या राष्ट्रिय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् का यह कार्य भारत की नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, इतिहास व साहित्य से दूर रखने कुकृत्य नहीं ?

मंगलवार, 26 मार्च 2013

होली की हार्दिक शुभकामनायें


होली की हार्दिक शुभकामनायें 

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

हिंदी के मुहावरे


        हिंदी के मुहावरे 

हिंदी के मुहावरे ,बड़े ही बावरे है 
खाने पीने की चीजों से भरे है 
कहीं पर फल है तो कहीं आटा दालें  है  
कहीं  पर मिठाई है,कहीं पर मसाले है 
फलों की ही बात लेलो ,
आम के आम,गुठलियों के भी दाम मिलते है 
कभी अंगूर खट्टे हैं,
कभी खरबूजे,खरबूजे को देख कर रंग बदलते है 
कहीं दाल में काला है,
कोई डेड़ चांवल की खिचड़ी  पकाता है 
कहीं किसी की दाल नहीं गलती,
कोई लोहे के चने चबाता है 
कोई घर बैठा रोटियां तोड़ता है,
कोई दाल भात में मूसरचंद बन जाता है 
मुफलिसी में जब आटा  गीला होता है ,
तो आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाता है 
सफलता के लिए  बेलना पड़ते  है कई पापड 
आटे  में नमक तो जाता है चल 
,पर गेंहू के साथ,घुन भी पिस जाता है 
अपना हाल तो बेहाल है 
ये मुंह और मसूर की दाल है 
गुड खाते हैं और गुलगुले से परहेज करते है 
और गुड का गोबर कर बैठते है 
कभी तिल का ताड़,कभी राई का पर्वत बनता है 
कभी ऊँट के मुंह में जीरा है ,
कभी कोई जले पर नमक छिड़कता है 
किसी के दांत दूध के है ,
किसी को छटी  का दूध याद आ जाता है 
दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक पीता है ,
और दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है 
शादी बूरे  के लड्डू है ,जिनने खाए वो भी पछताए,
और जिनने नहीं खाए ,वो भी पछताते  है 
पर शादी की बात सुन ,मन में लड्डू फूटते है ,
और शादी के बाद ,दोनों हाथों  में लड्डू आते है 
कोई जलेबी की तरह सीधा है ,कोई टेढ़ी खीर है 
किसी के मुंह में घी शक्कर है ,
सबकी अपनी अपनी तकदीर है 
कभी कोई चाय पानी करवाता है ,
कोई मख्खन लगाता है 
और जब छप्पर फाड़ कर कुछ मिलता है ,
तो सभी के मुंह में पानी आता है 
भाई साहब अब कुछ भी हो ,
घी तो खिचड़ी में ही जाता है 
जितने मुंह है,उतनी बातें है 
सब अपनी अपनी बीन बजाते है 
पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है ,
सभी बहरे है,बावरें है 
ये सब हिंदी के मुहावरें 

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

'महाराष्ट्रलोकसेवा आयोग'(एमपीएससी) की परीक्षाएं हिंदी और उर्दू मेंलेने का विरोध


शिवसेना ने हिंदी विरोधी तेवर अपनाते हुए 'महाराष्ट्रलोकसेवा आयोग'(एमपीएससी) की परीक्षाएं हिंदी और उर्दू मेंलेने का विरोध किया है। पार्टी ने इसे सरकार का 'छिपाषडयंत्र' बताया है। शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' ने मराठीयुवकों को अपने ही राज्य में नजरअंदाज किए जाने के खिलाफहर तरह के संघर्ष के लिए तैयार होने की घोषणा की है।
पार्टी
 मुखपत्र में कहा गया है कि राज्य सरकार का पूराकामकाज मराठी में चलता है, लेकिन राज्य में परप्रांतीयों केबढ़ते सैलाब और उनके नेताओं के दबाव में केंद्र सरकार मराठीके अलावा हिंदी और उर्दू को अतिरिक्त भाषा का दर्जा देने की साजिश रच रही है। पार्टी प्रवक्ता  सांसद संजयराऊत ने कहा है कि महाराष्ट्र में लोकसेवा आयोग की परीक्षाएं मराठी के साथ हिंदी और उर्दू में लेने का षडयंत्ररचा गया है। सरकार के इस निर्णय को शिवसेना जबरदस्त टक्कर देगी।
उन्होंने
 कहा, राज्य लोकसेवा आयोग की परीक्षा उनउन राज्यों में उनकी स्थानीय भाषाओं में होने चाहिए, यहशिवसेना की भूमिका है। सरकार ने अपने राज्य के मराठी जनों के पीठ में खंजर घोंपने का प्रयास किया, वह खुदइसके परिणामों की जिम्मेदार होगी।
मराठी
 बलिदान का अपमान: राऊत ने रोष व्यक्त करते हुए कहा है कि यह निर्णय मराठी भाषा का खून करनेजैसा है। राज्य लोकसेवा आयोग की परीक्षा से डेप्यूटी कलेक्टर, तहसीलदार, फौजदार, डीएसपी, स्वास्थ्य औरराजस्व सेवा में मराठी तरुणों को मौका मिलता है। सिर्फ वोटों को सामने रखकर अगर उर्दू और हिंदी में परीक्षाएंली जाएंगी, तो यह मराठी राज्य के लिए बलिदान देने वाले 105 शहीदों का अपमान होगा।
उर्दूको
 NEET परीक्षामेंभीशामिलकरो: आजमीसमाजवादी पार्टी के मुंबई महाराष्ट्र अध्यक्ष विधायक अबू आसिम आजमी नैशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेस टेस्ट(एनईईटी) परीक्षा में भी शामिल किया जाए। उन्होंने सवाल उटाया कि जब देश की सभी शेड्युल्ड भाषाओं मेंयह परीक्षा दी जा सकती है तो उर्दू के साथ सौतेला बर्ताव क्यों? आजमी ने केंद्री सरकार को खत लिखकर उर्दूभाषा को शामिल किए जाने की मांग की है।

मनपसंद ऑडियो बुक सुनने का मजा ही कुछ और है


बहुत जल्द आपके पढ़ने का अंदाज बदल जाएगा। जी हां, बोलने वाली किताबें हमारी जिंदगी में धीरे-धीरे पैर पसार रही हैं। इंटरनैशनल बुक फेयर में इस बार बोलने वाली किताबों में लोग काफी दिलचस्पी ले रहे हैं।दिल्ली की कंपनी रीडो इस कॉन्सेप्ट को आगे बढ़ा रही है।

दिल्ली जैसे शहर में कम से कम एक घंटे की ड्राइव के बाद या मेट्रो पकड़ कर लोग अपने वर्क प्लेस पर पहुंचते हैं। इस दौरान बार-बार एफएम चैनल बदलने और उस पर कुछ भी सुनने के बजाय मनपसंद ऑडियो बुक सुनने का मजा ही कुछ और है। पीतमपुरा से गुड़गांव अपने जॉब पर मेट्रो से जाने वाले विकास नंदा कहते हैं कि मेट्रो में कोने की सीट लेता हूं। फिर अपने आईफोन पर ऑडियो बुक खोल लेता हूं। पेशे से एक आईटी कंपनी में प्रोग्रामर नंदा कहते हैं कि बड़े दिनों से स्टीव जॉब्स की ऑटोबायोग्राफी पढ़ने की तमन्ना थी लेकिन फुर्सत नहीं मिलती थी।

रीडो ने इस काम को आसान कर दिया है। सीपी में जॉब करने वाले ललित अरोड़ा ने भी एक हफ्ते पहले ही पत्रकार एस. हुसैन जैदी की मशहूर किताब डोंगरी टु दुबई ऑडियो बुक मेट्रो में रोजाना सफर करते हुए सुनी। इस बुक में माफिया डॉन दाऊद इब्राहीम और बाकी क्रिमिनल्स की कहानी है। रीडो के सीईओ 32 साल के सुमित सुनेजा कहते हैं कि अगले पांच सालों में भारत में यह इंडस्ट्री 100 मिलियन यूएस डॉलर की होने वाली है और अगले 10 सालों में यह 500 मिलियन यूएस डॉलर की हो जाएगी। हालांकि यह अभी भी अमेरिका के 7 बिलियन डॉलर बिजनेस के मुकाबले काफी पीछे है। पर, कल के बारे में कौन जानता है। उनकी खुद की कंपनी ने पिछले 18 महीनों में सेवन टाइम्स ग्रोथ की है, जो बकौल सुनेजा उम्मीद से ज्यादा है।
सुमित ने बताया कि अभी सारा बिजनेस अंग्रेजी के दम पर है लेकिन अगले बुक फेयर में वह हिंदी के मशहूर उपन्यास और दूसरी किताबों के टाइटल लेकर हाजिर होंगे। उस वक्त बहुत अजीब लगता है जब हमारी भगवद् गीता की ऑडियो बुक हम किसी अमेरिकी कंपनी से खरीदने को मजबूर हों। हिंदी में बिजनेस पोटेंशियल गजब का है, आप बहुत बड़े ऑडियंस से जुड़ते हैं। हिंदी के कम से कम सौ टाइटल लेकर आने का इरादा है। यानी श्रोता को किसी टाइटल के न मिलने पर अफसोस न करना पड़े।
पर हिंदी को लेकर उनका नजरिया बहुत साफ है। हिंदी में हमारी ऑडियो बुक्स आम बोलचाल वाली भाषा में होंगी जो बच्चों से लेकर बूढ़ों तक को समझ में आए। हिंदी में हम ऐसा कुछ करना चाहते हैं कि हिंदी वालों को भी उसे देखकर और सुनकर रश्क हो।