संसदीय समिति के दौरे से संबंधित ड्यूटी पर तैनात श्री राजीव सारस्वत शहीद
हिनदूस्तान पैट्रोलियम कॉर्पोरेशन लि. मुंबई मे प्रबंधक राजभाषा के पद पर कार्यरत श्री राजीव सारस्वत ताज हॉटेल में संसदीय समिति के दौरे से संबंधित ड्यूटी पर तैनात थे । सरकारी काम पर रहते हुए आतंकी हमले के दौरान शहीद हो गए ।
मुरादाबाद उत्तर प्रदेश निवासी श्री राजीव सारस्वत विगत 20 से भी अधिक वर्षोसे मुंबई में पत्रकारिता लेखन एवं साहित्य से जुडे थे । हसमुख एवं मिलनसार व्यक्तितव मे मालिक श्री राजीव सारस्वत संबंदनशील कवि भी थे । महानगर मुंबई में वे राजभाषा हिन्दी प्रेमी के रूप में खासे लोकप्रिय थे । राजभाषा के क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है । मुबई की कई साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं केवे पदाधिकारी रहे हैं । वे एक अच्छे मंच संचालक के रूप में भी जाने जाते रहे हैं । विशेषकर प्रश्नमंच एवं क्विज जैसे कार्यक्रमों के संचालन में उन्हे महारत हासिल थी । ऐसे कार्यक्रमों के संचालन केलिए व मुंबई से बाहर भी बुलाए जाते रहे हैं ।
उन्होने छोटे- बडे लगभग दो सौ कार्यक्रमों का सफल संचालन किया , उनके आक्समिक निधन से न केवल एक हिन्दी प्रेमी वरन् एक उभरता हुआ रचनाकार संवेदनशील साहित्यकार खोगया है जिसकी क्षति लंबे समय तक महसूस की जाती रहेगी ।
उनके आक्समिक निधन पर महानगर की अनेक संस्थाओं ने गहरा दुख व्यक्त किया है और शोक संतृप्त परिवार के प्रति अपनी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि प्रेषित की है जिनमें प्रमुख है - श्रुति संवाद साहितय कला अकादमी, नवी मुंबई, बतरत, वाग्धारा , हिन्दीप्रचार एवं शोध संस्थान, हिन्दी कंपयूटिंग फाउण्डेशन, आर्शीवाद, आदि ।
रविवार, 30 नवंबर 2008
शनिवार, 29 नवंबर 2008
दूसरों की जिंदगियों से खेलने वालों की जब अपनी जान
दूसरों की जिंदगियों से खेलने वालों की जब अपनी जान पर बन आती है तो वह कैसे गिड़गिड़ाने लगते हैं, छत्रपति शिवाजी टर्मिनल से गिफ्तार आतंकी ने कुछ यही दिखाया। सीएसटी पर हमला कर भाग रहे इस 18 साल के बांग्लादेशी युवक को पुलिस ने तुरंत धर दबोचा था। उसका साथी पुलिस की मुठभेड़ में मारा गया था। गोली लगने से घायल हुए इस आतंकी युवक को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया। शुरुआत में तो वह कुछ नहीं बोला, लेकिन जब उसे अहसास हुआ कि उसका एक साथी मारा गया है तो वह बुरी तरह से टूट गया। इसके बाद वह लगा अपनी जान की भीख मांगने। उसने सुरक्षा बलों और मेडिकल स्टाफ के सामने गिड़गिड़ाना शुरू कर दिया। ' प्लीज मुझे बचा लो, मैं मरना नहीं चाहता। ' कुछ यही शब्द थे उसके। पुलिस ने जब उसकी तलाशी ली, तो उससे हथियार और मोबाइल फोन बरामद किया गया। यही नहीं छत्रपति शिवाजी टर्मिनल में कैसे तबाही मचानी है, उसके पास इसका बाकायदा एक मास्टर प्लान मौजूद था। उसे करीब चार घंटे तक अस्पताल में रखा गया। डॉक्टरों ने उसके शरीर से गोली निकाली और सुरक्षा बलों को सौंप दिया। इसके बाद उसे अनजान जगह पर ले जाया गया। इस दौरान वह इतना डरा हुआ था कि वह फिर गिड़गिड़ाने लगा। लेकिन इस बार अपनी जान बचाने के लिए नहीं, बल्कि खुद को मार दिए जाने के लिए। वह सुरक्षा बलों से बार-बार कह रहा था, 'अब मैं जीना नहीं चाहता। मुझे मार दो।' मुंबई में आतंक की इबारत रखने वाले इतनी कम उम्र और फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले युवकों के शामिल होने से आतंक का एक नया चेहरा सामने आया है।
टूरिस्टों की एंट्री व एक्जिट को पूरी तरह रेगयुलेट करने को कहा है।
सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय ने होटेल इंडस्ट्री से होटेल
में आने वाले सभी टूरिस्टों की एंट्री व एक्जिट को पूरी तरह रेगयुलेट करने को कहा है। साथ ही होटेल के भीतर और परिसर में सिक्यूरिटी सिस्टम को अधिक मजबूत करने का भी सुझाव दिया है। सूत्रों का कहना है कि मुंबई के जिन होटेलों में आतंकवादी घुसे हैं, वहां सिक्यूरिटी बहुत ज्यादा कड़ी नहीं थी। एक रुटीन सिक्यूरिटी लागू रहती थी। होटेलों के अपने सिक्यूरिटी कंट्रोल रूम भी बहुत इफेक्टिव नहीं थे। सूत्रों का कहना है कि जरूरत के हिसाब से मुंबई सहित दिल्ली और अन्य राज्यों के सभी होटेलों में जनरल सिक्यूरिटी का इंतजाम रहता है। आतंकवादियों को यह बात मालूम थी कि वे इन तीनों होटेलों में बिना किसी प्रतिरोध के प्रवेश कर सकते हैं। आतंकवादियों ने बहुत ही प्लानिंग के साथ इन होटेलों को अपना टारगेट चुना। बताया जाता है कि होटेलों में घुसने के बाद इनका अपने आतंकवादी ग्रुप के साथ कम्यूनिकेशन भी आसानी से बना रहा, जिससे उन्हें अपने आतंकी इरादों को अंजाम देना और आसान हो गया। अब सुझाव है कि सभी लेवल के होटेल मैनिजमंट अपने होटलों की मुख्य लॉबी और हर फ्लोर पर रणनीतिक तरीके से क्लोज सर्किट कैमरे फिट करें ताकि किसी भी तरह की दुर्घटना रोकने में उनसे मदद मिल सके। बड़े होटेलों के अलार्म सिस्टम को पुलिस कंट्रोल रूम से जोड़ा जाए। इस बीच भारतीय पर्यटन विकास निगम (आईटीडीसी) के अशोक होटेल सहित सभी होटेलों में सिक्यूरिटी इंतजाम और मजबूत कर दिए गए हैं। अशोक होटेल, सम्राट होटेल और जनपथ होटेल में सभी प्रमुख बिंदुओं पर मेटल डिटेक्टर लगाए जा रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि यहां तक कि आने वाले मेहमानों के समान को भी मेटल डिटेक्टर से पास कराने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही हर फ्लोर पर अलग से सिक्यूरिटी पर्सनल तैनात करने के निर्देश दिए गए हैं।
में आने वाले सभी टूरिस्टों की एंट्री व एक्जिट को पूरी तरह रेगयुलेट करने को कहा है। साथ ही होटेल के भीतर और परिसर में सिक्यूरिटी सिस्टम को अधिक मजबूत करने का भी सुझाव दिया है। सूत्रों का कहना है कि मुंबई के जिन होटेलों में आतंकवादी घुसे हैं, वहां सिक्यूरिटी बहुत ज्यादा कड़ी नहीं थी। एक रुटीन सिक्यूरिटी लागू रहती थी। होटेलों के अपने सिक्यूरिटी कंट्रोल रूम भी बहुत इफेक्टिव नहीं थे। सूत्रों का कहना है कि जरूरत के हिसाब से मुंबई सहित दिल्ली और अन्य राज्यों के सभी होटेलों में जनरल सिक्यूरिटी का इंतजाम रहता है। आतंकवादियों को यह बात मालूम थी कि वे इन तीनों होटेलों में बिना किसी प्रतिरोध के प्रवेश कर सकते हैं। आतंकवादियों ने बहुत ही प्लानिंग के साथ इन होटेलों को अपना टारगेट चुना। बताया जाता है कि होटेलों में घुसने के बाद इनका अपने आतंकवादी ग्रुप के साथ कम्यूनिकेशन भी आसानी से बना रहा, जिससे उन्हें अपने आतंकी इरादों को अंजाम देना और आसान हो गया। अब सुझाव है कि सभी लेवल के होटेल मैनिजमंट अपने होटलों की मुख्य लॉबी और हर फ्लोर पर रणनीतिक तरीके से क्लोज सर्किट कैमरे फिट करें ताकि किसी भी तरह की दुर्घटना रोकने में उनसे मदद मिल सके। बड़े होटेलों के अलार्म सिस्टम को पुलिस कंट्रोल रूम से जोड़ा जाए। इस बीच भारतीय पर्यटन विकास निगम (आईटीडीसी) के अशोक होटेल सहित सभी होटेलों में सिक्यूरिटी इंतजाम और मजबूत कर दिए गए हैं। अशोक होटेल, सम्राट होटेल और जनपथ होटेल में सभी प्रमुख बिंदुओं पर मेटल डिटेक्टर लगाए जा रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि यहां तक कि आने वाले मेहमानों के समान को भी मेटल डिटेक्टर से पास कराने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही हर फ्लोर पर अलग से सिक्यूरिटी पर्सनल तैनात करने के निर्देश दिए गए हैं।
आतंक का मुकाबला करने में धर्म कहीं से आड़े नहीं आता।
मुंबई की आतंकी घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। लोगों को लग रहा
है कि जिहाद के नाम पर देश को बांटने की साजिश हो रही है। लेकिन फरीदाबाद के सेक्टर 48 में रहने वाले एक मुस्लिम परिवार ने यह साबित कर दिया है कि आतंक का मुकाबला करने में धर्म कहीं से आड़े नहीं आता। यह परिवार पिछले तीन दिनों से गौतम के परिजनों को संबल देने का काम कर रहा है। शमशाद का कहना है वह पड़ोसी धर्म का पालन कर रहे हैं। उनका कहना है कि आतंकी का किसी मजहब से वास्ता नहीं होता है। मुंबई में आतंकी हमले में मारे गए स्टूडंट गौतम गुसाईं के घर पर शमसाद अख्तर का परिवार गुरुवार सुबह से ही मौजूद है। ये लोग हर पल की तकलीफों को कम करने में जुटे हैं। इस परिवार ने मजहब को बांटने की कोशिश करने वालों को मेसिज दे दिया है कि वह कुछ भी कर लें अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हो सकते। इस दुख की घड़ी में सेक्टर के लोग भी गुसाईं परिवार का दर्द बांटने के लिए साथ खड़े हैं। शुक्रवार को भी घर के बाहर सैकड़ों लोगों की भीड़ लगी रही। वहां मौजूद हर शख्स की जुबान पर सिर्फ गौतम का ही नाम था। शमसाद अख्तर कहते हैं कि इस दुख की घड़ी में वे गुसाईं परिवार के साथ खड़े हैं। जब उन्होंने गौतम के बारे में खबर सुनी फौरन देव सिंह गुसाईं के घर की तरफ दौड़ पड़े। घर के अंदर जब पहुंचे तो एक तरफ देव बेसुध पड़े थे, तो दूसरी तरफ उनकी पत्नी बदहवाश हालत में घर के अंदर इधर-उधर भटक रही थी। ऐसी हालत में उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा था। इतने में उनकी पत्नी भी वहां आ गई। इससे उन्हें संभालने का मौका मिला। धीरे-धीरे उन्हें देव सिंह के परिचितों को घटना की जानकारी दी। वह कहते हैं कि उन्होंने मुंबई जाने की भी इच्छा थी, लेकिन कुछ लोगों ने यहां आए बाकी परिवार वालों का ध्यान रखने की बात कहकर रोक लिया।
है कि जिहाद के नाम पर देश को बांटने की साजिश हो रही है। लेकिन फरीदाबाद के सेक्टर 48 में रहने वाले एक मुस्लिम परिवार ने यह साबित कर दिया है कि आतंक का मुकाबला करने में धर्म कहीं से आड़े नहीं आता। यह परिवार पिछले तीन दिनों से गौतम के परिजनों को संबल देने का काम कर रहा है। शमशाद का कहना है वह पड़ोसी धर्म का पालन कर रहे हैं। उनका कहना है कि आतंकी का किसी मजहब से वास्ता नहीं होता है। मुंबई में आतंकी हमले में मारे गए स्टूडंट गौतम गुसाईं के घर पर शमसाद अख्तर का परिवार गुरुवार सुबह से ही मौजूद है। ये लोग हर पल की तकलीफों को कम करने में जुटे हैं। इस परिवार ने मजहब को बांटने की कोशिश करने वालों को मेसिज दे दिया है कि वह कुछ भी कर लें अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हो सकते। इस दुख की घड़ी में सेक्टर के लोग भी गुसाईं परिवार का दर्द बांटने के लिए साथ खड़े हैं। शुक्रवार को भी घर के बाहर सैकड़ों लोगों की भीड़ लगी रही। वहां मौजूद हर शख्स की जुबान पर सिर्फ गौतम का ही नाम था। शमसाद अख्तर कहते हैं कि इस दुख की घड़ी में वे गुसाईं परिवार के साथ खड़े हैं। जब उन्होंने गौतम के बारे में खबर सुनी फौरन देव सिंह गुसाईं के घर की तरफ दौड़ पड़े। घर के अंदर जब पहुंचे तो एक तरफ देव बेसुध पड़े थे, तो दूसरी तरफ उनकी पत्नी बदहवाश हालत में घर के अंदर इधर-उधर भटक रही थी। ऐसी हालत में उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा था। इतने में उनकी पत्नी भी वहां आ गई। इससे उन्हें संभालने का मौका मिला। धीरे-धीरे उन्हें देव सिंह के परिचितों को घटना की जानकारी दी। वह कहते हैं कि उन्होंने मुंबई जाने की भी इच्छा थी, लेकिन कुछ लोगों ने यहां आए बाकी परिवार वालों का ध्यान रखने की बात कहकर रोक लिया।
आतंकवादियों ने हमले से पहले प्रमुख स्थलों की जानकारी प्राप्त की थी
मुंबई: ताज होटल से कमांडो कार्रवाई कर आतंकवादियों को मार गिराने वाले मरीन कमांड
ो ने दोपहर को बताया कि आतंकवादियों ने हमले से पहले प्रमुख स्थलों की जानकारी प्राप्त की थी और उन्हें होटल की इमारत की भी जानकारी थी। भारतीय नौसेना के प्रतिष्ठित मरीन कमांडो (मारकोस) ने कहा कि उनकी टीम को तीन से चार आतंकवादियों का आभास हुआ, जो संभवत: अलग-अलग तलों से हमले कर रहे थे। उन्हें ताज होटल की रचना के बारे में जानकारी थी, जहां वे करीब 40 घंटे से थे। कमांडो दल ने होटेल में 50 शव देखे। उन्होंने कहा, '12से 15 शव केवल एक कमरे में देखे गये।' काला स्कार्फ पहने और चश्मा लगाए हुए अज्ञात कमांडो ने संवाददाताओं से कहा, 'वे ऐसे किस्म के लोग थे, जिन्हें कोई पश्चाताप नहीं था। उनके सामने जो भी आया, उसे गोली मार दी।' उन्होंने बताया कि ताज होटल से भाग जाने में सफल रहे एक आतंकवादी के थैले से मॉरीशस के एक नागरिक का पहचान पत्र बरामद किया गया है। उन्होंने बताया कि आतंकवादी अलग-अलग मंजिलों से ग्रेनेड फेंक रहे थे और गोलियां चला रहे थे। अंधेरा होने के कारण उन्हें देखा नहीं जा सका और वे आसानी से काम कर रहे थे। मारकोस ने कहा, 'लाशें नीचे इधर-उधर पड़ी हुई थीं। हर तरफ खून था और इन नागरिकों को बचाने के लिए हमें काफी सतर्क रहना पड़ा था।' आतंकवादियों के पास जो हथियार थे, उन्हें चलाने के लिए इन्हें प्रशिक्षण दिया गया होगा। सभी लोग एके सीरीज के हथियार नहीं चला सकते।
ो ने दोपहर को बताया कि आतंकवादियों ने हमले से पहले प्रमुख स्थलों की जानकारी प्राप्त की थी और उन्हें होटल की इमारत की भी जानकारी थी। भारतीय नौसेना के प्रतिष्ठित मरीन कमांडो (मारकोस) ने कहा कि उनकी टीम को तीन से चार आतंकवादियों का आभास हुआ, जो संभवत: अलग-अलग तलों से हमले कर रहे थे। उन्हें ताज होटल की रचना के बारे में जानकारी थी, जहां वे करीब 40 घंटे से थे। कमांडो दल ने होटेल में 50 शव देखे। उन्होंने कहा, '12से 15 शव केवल एक कमरे में देखे गये।' काला स्कार्फ पहने और चश्मा लगाए हुए अज्ञात कमांडो ने संवाददाताओं से कहा, 'वे ऐसे किस्म के लोग थे, जिन्हें कोई पश्चाताप नहीं था। उनके सामने जो भी आया, उसे गोली मार दी।' उन्होंने बताया कि ताज होटल से भाग जाने में सफल रहे एक आतंकवादी के थैले से मॉरीशस के एक नागरिक का पहचान पत्र बरामद किया गया है। उन्होंने बताया कि आतंकवादी अलग-अलग मंजिलों से ग्रेनेड फेंक रहे थे और गोलियां चला रहे थे। अंधेरा होने के कारण उन्हें देखा नहीं जा सका और वे आसानी से काम कर रहे थे। मारकोस ने कहा, 'लाशें नीचे इधर-उधर पड़ी हुई थीं। हर तरफ खून था और इन नागरिकों को बचाने के लिए हमें काफी सतर्क रहना पड़ा था।' आतंकवादियों के पास जो हथियार थे, उन्हें चलाने के लिए इन्हें प्रशिक्षण दिया गया होगा। सभी लोग एके सीरीज के हथियार नहीं चला सकते।
राजीव सारस्वत का अभी भी पता नहीं,
राजीव सारस्वत का अभी भी पता नहीं, वह होटल में संसदीय समिति के काम पर थे ।
नरीमन हाउस को आतंकवादियों से खाली करवा लिया गया है..यह घोषणा सुनते ही वहां मौजूद लोगों ने जय-जयकार शुरू कर दी। मुझे यकीन है टीवी के आगे बंधे बैठे पूरे मुल्क के बहुत सारे लोग उस जय-जयकार में शामिल थे। मैं नहीं था। चाहते हुए भी नहीं...बल्कि मुझे तो शर्म आ रही थी। मरीन हाउस के ' गौरवपूर्ण ' दृश्यों को दिखाते टीवी एंकर बोल रहे थे – यह गर्व की बात है , हमारे बहादुर जवानों ने आतंक पर एक जंग जीत ली है , नरीमन हाउस पर कब्जा हो गया है। नीचे न्यूज फ्लैश चल रहा था – नरीमन हाउस में आतंकियों का सफाया...दो आतंकी मारे गए...पांच बंधकों के भी शव मिले...एक एनएसजी कमांडो शहीद। किस बात पर गर्व करें ? पांच मासूम जानें और एक बेशकीमती सैनिक खो देने के बाद दो आतंकवादियों के सफाए पर ? 10-20-50 लोग मनचाहे हथियार और गोलाबारूद लेकर आपके देश में घुसते हैं। जहां चाहे बम फोड़ देते हैं। खुलेआम सड़कों पर फायरिंग करते हैं। आपकी बेहद आलीशान और सुरक्षित इमारतों पर कब्जा कर लेते हैं। आपकी पुलिस के सबसे बड़े ओहदों पर बैठे अफसरों को मार गिराते हैं। सैकड़ों लोगों को कत्ल कर देते हैं। आपके मेहमानों को बंधक बना लेते हैं। आपकी खेल प्रतियोगिताओं को बंद करवा देते हैं। आपके प्रधानमंत्री और बड़े-बड़े नेताओं की घिग्घी बांध देते हैं। तीन दिन तक आपके सबसे कुशल सैकड़ों सैनिकों के साथ चूहे-बिल्ली का खेल खेलते हैं और इसलिए मारे जाते हैं क्योंकि वे सोचकर आए थे...इसे आप जीत कहेंगे ? क्या यह गर्व करने लायक बात है ? आपको क्या लगता है , देश पर सबसे बड़ा आतंकी हमला करनेवाले आतंकवादियों को मारकर आतंक के खिलाफ यह जंग हमने जीत ली है ? हम इस जंग में बुरी तरह हार गए हैं। उन लोगों ने जो चाहा किया , जिसे चाहा मारा , जिस हद तक खींच सके खींचा। आपको क्या लगता है , बंधकों को सेना ने बचाया है ? जब वे होटलों में घुसे तो हजारों लोग उनके निशाने पर थे। वे चाहते तो सबको मार सकते थे। उनके पास इतना गोला-बारूद था कि ताज और ओबरॉय होटेलों का नाम-ओ-निशान तक नहीं बचता। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने इंतजार किया कि पूरी दुनिया का मीडिया उनके आगे घुटने टेक कर और जमीन पर लेटकर यह दिखाने को मजबूर हो जाए कि वे क्या कर सकते हैं। उनकी चलाई एक-एक गोली पर रिपोर्टर्स चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे थे – देखिए एक गोली और चली। इसे आप जीत कहेंगे ? यह देश पर सबसे बड़ा आतंकी हमला था...1993 के बम ब्लास्ट के बाद भी यही कहा गया था। जब वे हमारा जहाज कंधार उड़ा ले गए थे , तब भी यही कहा था। संसद पर हमला हुआ तब भी यह शब्द थे। अहमदाबाद को उड़ाया था , तब भी सब यही सोच रहे थे। दिल्ली , जयपुर , मुंबई लोकल...हर बार उनका हमला बड़ा होता गया...क्या लगता है अब इससे बड़ा हमला नहीं हो सकता ? बड़े आराम से होगा और हम तब भी यही कह रहे होंगे। क्या इसका इलाज अफजल की फांसी में है ? क्या इसका इलाज पाकिस्तान पर हमले में है ? क्या इसका इलाज पोटा में है ? आतंकियों ने अपने ई-मेल में लिखा था कि वे महाराष्ट्र एटीएस के मुसलमानों पर जुल्म का बदला ले रहे हैं। वे गुजरात का बदला ले रहे हैं। वे आजमगढ़ का बदला ले रहे हैं। वे धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं। भले ही उनकी गोलियों से मुसलमान भी मरे , लेकिन वे मुसलमानों के नाम पर लड़ रहे हैं। शर्म आनी चाहिए उन मुसलमानों को जो इस लड़ाई को अपनी मानते हैं। लेकिन यूपी के किसी छोटे से शहर के कॉलेज में पढ़ने वाला 20-25 साल का मुस्लिम लड़का जब देखेगा कि आजमगढ़ से हुई किसी भी गिरफ्तारी को सही ठहरा देने वाले लोग कर्नल पुरोहित और दयानंद पांडे से चल रही पूछताछ पर ही सवाल उठा देते हैं , तो क्या वह धर्म के नाम पर हो रही इस लड़ाई से प्रभावित नहीं होगा ? क्या गुजरात को गोधरा की ' प्रतिक्रिया ' बताने वाले लोग मुंबई को गुजरात की प्रतिक्रिया मानने से इनकार कर पाएंगे ? और अब क्या इस प्रतिक्रिया की प्रतिक्रिया यह हो कि कुछ और मालेगांव किए जाएं ? और फिर जवाबी प्रतिक्रिया का इंतज़ार किया जाए ? फिर हिंदू प्रतिक्रिया हो... फिर...लेकिन क्या इससे आतंकवादी हमले बंद हो जाएंगे ? क्या इससे जंग जीती जा सकेगी ? जो लोग कहते हैं कि अफज़ल को फांसी हो जाती तो ऐसे हमले नहीं होते , वे भूल जाते हैं कि ये सारे आतंकवादी वे हैं जो जानते हैं कि वे इस ऑपरेशन में बच नहीं पाएंगे। वे मरने और मारने के लिए ही आए हैं। इसलिए यह कहना कि मौत का डर कुछ और लोगों को आतंकवादी बनने से रोक देगा , नादानी है। पाकिस्तान पर हमले की बात भी बचकानी है। जो यह कह रहे हैं , वे भारत को अमेरिका और पाकिस्तान को अफगानिस्तान समझ रहे हैं। यानी पाकिस्तान चूहा और हम शेर। जबकि हकीकत में दोनों सैन्य ताकत तकरीबन बराबर है। ऐटम बम दोनों के पास हैं और जैसे ही पहली गोली चलेगी , बाकी दुनिया दोनों को रोकने के लिए बीच में आ जाएगी। वैसे भी हम तब तक कोई कदम नहीं उठा सकते जब तक यह साफ न हो जाए कि जरदारी सरकार या पाक सेना डायरेक्टली इसमें शामिल है। इसलिए हमले से कुछ हासिल नहीं होगा जैसे कि पिछली तीन लड़ाइयों में कुछ हासिल नहीं हुआ। रही पोटा कानून की बात तो अगर आप मुंबई हमलों के पीछे की तैयारी की खबर पढ़ रहे होंगे तो आपको मालूम हो गया होगा कि गोला-बारूद गुजरात से होकर आया जहां नरेंद्र मोदी की राष्ट्रवादी पुलिस का राज चलता है। लेकिन राष्ट्रवाद का मतलब यह तो नहीं कि सारे नेता और पुलिस पैसों का महत्व भूल जाएं। तो जिस देश में आप 500 रुपये के बल पर पुलिस से कोई भी ट्रक पार करवा सकते हैं , वहां क्या यह हैरत की बात नहीं कि आतंकवादी घटनाएं इतनी कम कैसे होती हैं। वैसे भी जब पोटा था , तब भी आतंकवाद था , जब नहीं है , तब भी आतंकवाद है।
नरीमन हाउस को आतंकवादियों से खाली करवा लिया गया है..यह घोषणा सुनते ही वहां मौजूद लोगों ने जय-जयकार शुरू कर दी। मुझे यकीन है टीवी के आगे बंधे बैठे पूरे मुल्क के बहुत सारे लोग उस जय-जयकार में शामिल थे। मैं नहीं था। चाहते हुए भी नहीं...बल्कि मुझे तो शर्म आ रही थी। मरीन हाउस के ' गौरवपूर्ण ' दृश्यों को दिखाते टीवी एंकर बोल रहे थे – यह गर्व की बात है , हमारे बहादुर जवानों ने आतंक पर एक जंग जीत ली है , नरीमन हाउस पर कब्जा हो गया है। नीचे न्यूज फ्लैश चल रहा था – नरीमन हाउस में आतंकियों का सफाया...दो आतंकी मारे गए...पांच बंधकों के भी शव मिले...एक एनएसजी कमांडो शहीद। किस बात पर गर्व करें ? पांच मासूम जानें और एक बेशकीमती सैनिक खो देने के बाद दो आतंकवादियों के सफाए पर ? 10-20-50 लोग मनचाहे हथियार और गोलाबारूद लेकर आपके देश में घुसते हैं। जहां चाहे बम फोड़ देते हैं। खुलेआम सड़कों पर फायरिंग करते हैं। आपकी बेहद आलीशान और सुरक्षित इमारतों पर कब्जा कर लेते हैं। आपकी पुलिस के सबसे बड़े ओहदों पर बैठे अफसरों को मार गिराते हैं। सैकड़ों लोगों को कत्ल कर देते हैं। आपके मेहमानों को बंधक बना लेते हैं। आपकी खेल प्रतियोगिताओं को बंद करवा देते हैं। आपके प्रधानमंत्री और बड़े-बड़े नेताओं की घिग्घी बांध देते हैं। तीन दिन तक आपके सबसे कुशल सैकड़ों सैनिकों के साथ चूहे-बिल्ली का खेल खेलते हैं और इसलिए मारे जाते हैं क्योंकि वे सोचकर आए थे...इसे आप जीत कहेंगे ? क्या यह गर्व करने लायक बात है ? आपको क्या लगता है , देश पर सबसे बड़ा आतंकी हमला करनेवाले आतंकवादियों को मारकर आतंक के खिलाफ यह जंग हमने जीत ली है ? हम इस जंग में बुरी तरह हार गए हैं। उन लोगों ने जो चाहा किया , जिसे चाहा मारा , जिस हद तक खींच सके खींचा। आपको क्या लगता है , बंधकों को सेना ने बचाया है ? जब वे होटलों में घुसे तो हजारों लोग उनके निशाने पर थे। वे चाहते तो सबको मार सकते थे। उनके पास इतना गोला-बारूद था कि ताज और ओबरॉय होटेलों का नाम-ओ-निशान तक नहीं बचता। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने इंतजार किया कि पूरी दुनिया का मीडिया उनके आगे घुटने टेक कर और जमीन पर लेटकर यह दिखाने को मजबूर हो जाए कि वे क्या कर सकते हैं। उनकी चलाई एक-एक गोली पर रिपोर्टर्स चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे थे – देखिए एक गोली और चली। इसे आप जीत कहेंगे ? यह देश पर सबसे बड़ा आतंकी हमला था...1993 के बम ब्लास्ट के बाद भी यही कहा गया था। जब वे हमारा जहाज कंधार उड़ा ले गए थे , तब भी यही कहा था। संसद पर हमला हुआ तब भी यह शब्द थे। अहमदाबाद को उड़ाया था , तब भी सब यही सोच रहे थे। दिल्ली , जयपुर , मुंबई लोकल...हर बार उनका हमला बड़ा होता गया...क्या लगता है अब इससे बड़ा हमला नहीं हो सकता ? बड़े आराम से होगा और हम तब भी यही कह रहे होंगे। क्या इसका इलाज अफजल की फांसी में है ? क्या इसका इलाज पाकिस्तान पर हमले में है ? क्या इसका इलाज पोटा में है ? आतंकियों ने अपने ई-मेल में लिखा था कि वे महाराष्ट्र एटीएस के मुसलमानों पर जुल्म का बदला ले रहे हैं। वे गुजरात का बदला ले रहे हैं। वे आजमगढ़ का बदला ले रहे हैं। वे धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं। भले ही उनकी गोलियों से मुसलमान भी मरे , लेकिन वे मुसलमानों के नाम पर लड़ रहे हैं। शर्म आनी चाहिए उन मुसलमानों को जो इस लड़ाई को अपनी मानते हैं। लेकिन यूपी के किसी छोटे से शहर के कॉलेज में पढ़ने वाला 20-25 साल का मुस्लिम लड़का जब देखेगा कि आजमगढ़ से हुई किसी भी गिरफ्तारी को सही ठहरा देने वाले लोग कर्नल पुरोहित और दयानंद पांडे से चल रही पूछताछ पर ही सवाल उठा देते हैं , तो क्या वह धर्म के नाम पर हो रही इस लड़ाई से प्रभावित नहीं होगा ? क्या गुजरात को गोधरा की ' प्रतिक्रिया ' बताने वाले लोग मुंबई को गुजरात की प्रतिक्रिया मानने से इनकार कर पाएंगे ? और अब क्या इस प्रतिक्रिया की प्रतिक्रिया यह हो कि कुछ और मालेगांव किए जाएं ? और फिर जवाबी प्रतिक्रिया का इंतज़ार किया जाए ? फिर हिंदू प्रतिक्रिया हो... फिर...लेकिन क्या इससे आतंकवादी हमले बंद हो जाएंगे ? क्या इससे जंग जीती जा सकेगी ? जो लोग कहते हैं कि अफज़ल को फांसी हो जाती तो ऐसे हमले नहीं होते , वे भूल जाते हैं कि ये सारे आतंकवादी वे हैं जो जानते हैं कि वे इस ऑपरेशन में बच नहीं पाएंगे। वे मरने और मारने के लिए ही आए हैं। इसलिए यह कहना कि मौत का डर कुछ और लोगों को आतंकवादी बनने से रोक देगा , नादानी है। पाकिस्तान पर हमले की बात भी बचकानी है। जो यह कह रहे हैं , वे भारत को अमेरिका और पाकिस्तान को अफगानिस्तान समझ रहे हैं। यानी पाकिस्तान चूहा और हम शेर। जबकि हकीकत में दोनों सैन्य ताकत तकरीबन बराबर है। ऐटम बम दोनों के पास हैं और जैसे ही पहली गोली चलेगी , बाकी दुनिया दोनों को रोकने के लिए बीच में आ जाएगी। वैसे भी हम तब तक कोई कदम नहीं उठा सकते जब तक यह साफ न हो जाए कि जरदारी सरकार या पाक सेना डायरेक्टली इसमें शामिल है। इसलिए हमले से कुछ हासिल नहीं होगा जैसे कि पिछली तीन लड़ाइयों में कुछ हासिल नहीं हुआ। रही पोटा कानून की बात तो अगर आप मुंबई हमलों के पीछे की तैयारी की खबर पढ़ रहे होंगे तो आपको मालूम हो गया होगा कि गोला-बारूद गुजरात से होकर आया जहां नरेंद्र मोदी की राष्ट्रवादी पुलिस का राज चलता है। लेकिन राष्ट्रवाद का मतलब यह तो नहीं कि सारे नेता और पुलिस पैसों का महत्व भूल जाएं। तो जिस देश में आप 500 रुपये के बल पर पुलिस से कोई भी ट्रक पार करवा सकते हैं , वहां क्या यह हैरत की बात नहीं कि आतंकवादी घटनाएं इतनी कम कैसे होती हैं। वैसे भी जब पोटा था , तब भी आतंकवाद था , जब नहीं है , तब भी आतंकवाद है।
राजीव सारस्वत का अभी भी पता नहीं,
राजीव सारस्वत का अभी भी पता नहीं, वह होटल में संसदीय समिति के काम पर थे ।
नरीमन हाउस को आतंकवादियों से खाली करवा लिया गया है..यह घोषणा सुनते ही वहां मौजूद लोगों ने जय-जयकार शुरू कर दी। मुझे यकीन है टीवी के आगे बंधे बैठे पूरे मुल्क के बहुत सारे लोग उस जय-जयकार में शामिल थे। मैं नहीं था। चाहते हुए भी नहीं...बल्कि मुझे तो शर्म आ रही थी। मरीन हाउस के ' गौरवपूर्ण ' दृश्यों को दिखाते टीवी एंकर बोल रहे थे – यह गर्व की बात है , हमारे बहादुर जवानों ने आतंक पर एक जंग जीत ली है , नरीमन हाउस पर कब्जा हो गया है। नीचे न्यूज फ्लैश चल रहा था – नरीमन हाउस में आतंकियों का सफाया...दो आतंकी मारे गए...पांच बंधकों के भी शव मिले...एक एनएसजी कमांडो शहीद। किस बात पर गर्व करें ? पांच मासूम जानें और एक बेशकीमती सैनिक खो देने के बाद दो आतंकवादियों के सफाए पर ? 10-20-50 लोग मनचाहे हथियार और गोलाबारूद लेकर आपके देश में घुसते हैं। जहां चाहे बम फोड़ देते हैं। खुलेआम सड़कों पर फायरिंग करते हैं। आपकी बेहद आलीशान और सुरक्षित इमारतों पर कब्जा कर लेते हैं। आपकी पुलिस के सबसे बड़े ओहदों पर बैठे अफसरों को मार गिराते हैं। सैकड़ों लोगों को कत्ल कर देते हैं। आपके मेहमानों को बंधक बना लेते हैं। आपकी खेल प्रतियोगिताओं को बंद करवा देते हैं। आपके प्रधानमंत्री और बड़े-बड़े नेताओं की घिग्घी बांध देते हैं। तीन दिन तक आपके सबसे कुशल सैकड़ों सैनिकों के साथ चूहे-बिल्ली का खेल खेलते हैं और इसलिए मारे जाते हैं क्योंकि वे सोचकर आए थे...इसे आप जीत कहेंगे ? क्या यह गर्व करने लायक बात है ? आपको क्या लगता है , देश पर सबसे बड़ा आतंकी हमला करनेवाले आतंकवादियों को मारकर आतंक के खिलाफ यह जंग हमने जीत ली है ? हम इस जंग में बुरी तरह हार गए हैं। उन लोगों ने जो चाहा किया , जिसे चाहा मारा , जिस हद तक खींच सके खींचा। आपको क्या लगता है , बंधकों को सेना ने बचाया है ? जब वे होटलों में घुसे तो हजारों लोग उनके निशाने पर थे। वे चाहते तो सबको मार सकते थे। उनके पास इतना गोला-बारूद था कि ताज और ओबरॉय होटेलों का नाम-ओ-निशान तक नहीं बचता। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने इंतजार किया कि पूरी दुनिया का मीडिया उनके आगे घुटने टेक कर और जमीन पर लेटकर यह दिखाने को मजबूर हो जाए कि वे क्या कर सकते हैं। उनकी चलाई एक-एक गोली पर रिपोर्टर्स चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे थे – देखिए एक गोली और चली। इसे आप जीत कहेंगे ? यह देश पर सबसे बड़ा आतंकी हमला था...1993 के बम ब्लास्ट के बाद भी यही कहा गया था। जब वे हमारा जहाज कंधार उड़ा ले गए थे , तब भी यही कहा था। संसद पर हमला हुआ तब भी यह शब्द थे। अहमदाबाद को उड़ाया था , तब भी सब यही सोच रहे थे। दिल्ली , जयपुर , मुंबई लोकल...हर बार उनका हमला बड़ा होता गया...क्या लगता है अब इससे बड़ा हमला नहीं हो सकता ? बड़े आराम से होगा और हम तब भी यही कह रहे होंगे। क्या इसका इलाज अफजल की फांसी में है ? क्या इसका इलाज पाकिस्तान पर हमले में है ? क्या इसका इलाज पोटा में है ? आतंकियों ने अपने ई-मेल में लिखा था कि वे महाराष्ट्र एटीएस के मुसलमानों पर जुल्म का बदला ले रहे हैं। वे गुजरात का बदला ले रहे हैं। वे आजमगढ़ का बदला ले रहे हैं। वे धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं। भले ही उनकी गोलियों से मुसलमान भी मरे , लेकिन वे मुसलमानों के नाम पर लड़ रहे हैं। शर्म आनी चाहिए उन मुसलमानों को जो इस लड़ाई को अपनी मानते हैं। लेकिन यूपी के किसी छोटे से शहर के कॉलेज में पढ़ने वाला 20-25 साल का मुस्लिम लड़का जब देखेगा कि आजमगढ़ से हुई किसी भी गिरफ्तारी को सही ठहरा देने वाले लोग कर्नल पुरोहित और दयानंद पांडे से चल रही पूछताछ पर ही सवाल उठा देते हैं , तो क्या वह धर्म के नाम पर हो रही इस लड़ाई से प्रभावित नहीं होगा ? क्या गुजरात को गोधरा की ' प्रतिक्रिया ' बताने वाले लोग मुंबई को गुजरात की प्रतिक्रिया मानने से इनकार कर पाएंगे ? और अब क्या इस प्रतिक्रिया की प्रतिक्रिया यह हो कि कुछ और मालेगांव किए जाएं ? और फिर जवाबी प्रतिक्रिया का इंतज़ार किया जाए ? फिर हिंदू प्रतिक्रिया हो... फिर...लेकिन क्या इससे आतंकवादी हमले बंद हो जाएंगे ? क्या इससे जंग जीती जा सकेगी ? जो लोग कहते हैं कि अफज़ल को फांसी हो जाती तो ऐसे हमले नहीं होते , वे भूल जाते हैं कि ये सारे आतंकवादी वे हैं जो जानते हैं कि वे इस ऑपरेशन में बच नहीं पाएंगे। वे मरने और मारने के लिए ही आए हैं। इसलिए यह कहना कि मौत का डर कुछ और लोगों को आतंकवादी बनने से रोक देगा , नादानी है। पाकिस्तान पर हमले की बात भी बचकानी है। जो यह कह रहे हैं , वे भारत को अमेरिका और पाकिस्तान को अफगानिस्तान समझ रहे हैं। यानी पाकिस्तान चूहा और हम शेर। जबकि हकीकत में दोनों सैन्य ताकत तकरीबन बराबर है। ऐटम बम दोनों के पास हैं और जैसे ही पहली गोली चलेगी , बाकी दुनिया दोनों को रोकने के लिए बीच में आ जाएगी। वैसे भी हम तब तक कोई कदम नहीं उठा सकते जब तक यह साफ न हो जाए कि जरदारी सरकार या पाक सेना डायरेक्टली इसमें शामिल है। इसलिए हमले से कुछ हासिल नहीं होगा जैसे कि पिछली तीन लड़ाइयों में कुछ हासिल नहीं हुआ। रही पोटा कानून की बात तो अगर आप मुंबई हमलों के पीछे की तैयारी की खबर पढ़ रहे होंगे तो आपको मालूम हो गया होगा कि गोला-बारूद गुजरात से होकर आया जहां नरेंद्र मोदी की राष्ट्रवादी पुलिस का राज चलता है। लेकिन राष्ट्रवाद का मतलब यह तो नहीं कि सारे नेता और पुलिस पैसों का महत्व भूल जाएं। तो जिस देश में आप 500 रुपये के बल पर पुलिस से कोई भी ट्रक पार करवा सकते हैं , वहां क्या यह हैरत की बात नहीं कि आतंकवादी घटनाएं इतनी कम कैसे होती हैं। वैसे भी जब पोटा था , तब भी आतंकवाद था , जब नहीं है , तब भी आतंकवाद है।
नरीमन हाउस को आतंकवादियों से खाली करवा लिया गया है..यह घोषणा सुनते ही वहां मौजूद लोगों ने जय-जयकार शुरू कर दी। मुझे यकीन है टीवी के आगे बंधे बैठे पूरे मुल्क के बहुत सारे लोग उस जय-जयकार में शामिल थे। मैं नहीं था। चाहते हुए भी नहीं...बल्कि मुझे तो शर्म आ रही थी। मरीन हाउस के ' गौरवपूर्ण ' दृश्यों को दिखाते टीवी एंकर बोल रहे थे – यह गर्व की बात है , हमारे बहादुर जवानों ने आतंक पर एक जंग जीत ली है , नरीमन हाउस पर कब्जा हो गया है। नीचे न्यूज फ्लैश चल रहा था – नरीमन हाउस में आतंकियों का सफाया...दो आतंकी मारे गए...पांच बंधकों के भी शव मिले...एक एनएसजी कमांडो शहीद। किस बात पर गर्व करें ? पांच मासूम जानें और एक बेशकीमती सैनिक खो देने के बाद दो आतंकवादियों के सफाए पर ? 10-20-50 लोग मनचाहे हथियार और गोलाबारूद लेकर आपके देश में घुसते हैं। जहां चाहे बम फोड़ देते हैं। खुलेआम सड़कों पर फायरिंग करते हैं। आपकी बेहद आलीशान और सुरक्षित इमारतों पर कब्जा कर लेते हैं। आपकी पुलिस के सबसे बड़े ओहदों पर बैठे अफसरों को मार गिराते हैं। सैकड़ों लोगों को कत्ल कर देते हैं। आपके मेहमानों को बंधक बना लेते हैं। आपकी खेल प्रतियोगिताओं को बंद करवा देते हैं। आपके प्रधानमंत्री और बड़े-बड़े नेताओं की घिग्घी बांध देते हैं। तीन दिन तक आपके सबसे कुशल सैकड़ों सैनिकों के साथ चूहे-बिल्ली का खेल खेलते हैं और इसलिए मारे जाते हैं क्योंकि वे सोचकर आए थे...इसे आप जीत कहेंगे ? क्या यह गर्व करने लायक बात है ? आपको क्या लगता है , देश पर सबसे बड़ा आतंकी हमला करनेवाले आतंकवादियों को मारकर आतंक के खिलाफ यह जंग हमने जीत ली है ? हम इस जंग में बुरी तरह हार गए हैं। उन लोगों ने जो चाहा किया , जिसे चाहा मारा , जिस हद तक खींच सके खींचा। आपको क्या लगता है , बंधकों को सेना ने बचाया है ? जब वे होटलों में घुसे तो हजारों लोग उनके निशाने पर थे। वे चाहते तो सबको मार सकते थे। उनके पास इतना गोला-बारूद था कि ताज और ओबरॉय होटेलों का नाम-ओ-निशान तक नहीं बचता। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने इंतजार किया कि पूरी दुनिया का मीडिया उनके आगे घुटने टेक कर और जमीन पर लेटकर यह दिखाने को मजबूर हो जाए कि वे क्या कर सकते हैं। उनकी चलाई एक-एक गोली पर रिपोर्टर्स चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे थे – देखिए एक गोली और चली। इसे आप जीत कहेंगे ? यह देश पर सबसे बड़ा आतंकी हमला था...1993 के बम ब्लास्ट के बाद भी यही कहा गया था। जब वे हमारा जहाज कंधार उड़ा ले गए थे , तब भी यही कहा था। संसद पर हमला हुआ तब भी यह शब्द थे। अहमदाबाद को उड़ाया था , तब भी सब यही सोच रहे थे। दिल्ली , जयपुर , मुंबई लोकल...हर बार उनका हमला बड़ा होता गया...क्या लगता है अब इससे बड़ा हमला नहीं हो सकता ? बड़े आराम से होगा और हम तब भी यही कह रहे होंगे। क्या इसका इलाज अफजल की फांसी में है ? क्या इसका इलाज पाकिस्तान पर हमले में है ? क्या इसका इलाज पोटा में है ? आतंकियों ने अपने ई-मेल में लिखा था कि वे महाराष्ट्र एटीएस के मुसलमानों पर जुल्म का बदला ले रहे हैं। वे गुजरात का बदला ले रहे हैं। वे आजमगढ़ का बदला ले रहे हैं। वे धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं। भले ही उनकी गोलियों से मुसलमान भी मरे , लेकिन वे मुसलमानों के नाम पर लड़ रहे हैं। शर्म आनी चाहिए उन मुसलमानों को जो इस लड़ाई को अपनी मानते हैं। लेकिन यूपी के किसी छोटे से शहर के कॉलेज में पढ़ने वाला 20-25 साल का मुस्लिम लड़का जब देखेगा कि आजमगढ़ से हुई किसी भी गिरफ्तारी को सही ठहरा देने वाले लोग कर्नल पुरोहित और दयानंद पांडे से चल रही पूछताछ पर ही सवाल उठा देते हैं , तो क्या वह धर्म के नाम पर हो रही इस लड़ाई से प्रभावित नहीं होगा ? क्या गुजरात को गोधरा की ' प्रतिक्रिया ' बताने वाले लोग मुंबई को गुजरात की प्रतिक्रिया मानने से इनकार कर पाएंगे ? और अब क्या इस प्रतिक्रिया की प्रतिक्रिया यह हो कि कुछ और मालेगांव किए जाएं ? और फिर जवाबी प्रतिक्रिया का इंतज़ार किया जाए ? फिर हिंदू प्रतिक्रिया हो... फिर...लेकिन क्या इससे आतंकवादी हमले बंद हो जाएंगे ? क्या इससे जंग जीती जा सकेगी ? जो लोग कहते हैं कि अफज़ल को फांसी हो जाती तो ऐसे हमले नहीं होते , वे भूल जाते हैं कि ये सारे आतंकवादी वे हैं जो जानते हैं कि वे इस ऑपरेशन में बच नहीं पाएंगे। वे मरने और मारने के लिए ही आए हैं। इसलिए यह कहना कि मौत का डर कुछ और लोगों को आतंकवादी बनने से रोक देगा , नादानी है। पाकिस्तान पर हमले की बात भी बचकानी है। जो यह कह रहे हैं , वे भारत को अमेरिका और पाकिस्तान को अफगानिस्तान समझ रहे हैं। यानी पाकिस्तान चूहा और हम शेर। जबकि हकीकत में दोनों सैन्य ताकत तकरीबन बराबर है। ऐटम बम दोनों के पास हैं और जैसे ही पहली गोली चलेगी , बाकी दुनिया दोनों को रोकने के लिए बीच में आ जाएगी। वैसे भी हम तब तक कोई कदम नहीं उठा सकते जब तक यह साफ न हो जाए कि जरदारी सरकार या पाक सेना डायरेक्टली इसमें शामिल है। इसलिए हमले से कुछ हासिल नहीं होगा जैसे कि पिछली तीन लड़ाइयों में कुछ हासिल नहीं हुआ। रही पोटा कानून की बात तो अगर आप मुंबई हमलों के पीछे की तैयारी की खबर पढ़ रहे होंगे तो आपको मालूम हो गया होगा कि गोला-बारूद गुजरात से होकर आया जहां नरेंद्र मोदी की राष्ट्रवादी पुलिस का राज चलता है। लेकिन राष्ट्रवाद का मतलब यह तो नहीं कि सारे नेता और पुलिस पैसों का महत्व भूल जाएं। तो जिस देश में आप 500 रुपये के बल पर पुलिस से कोई भी ट्रक पार करवा सकते हैं , वहां क्या यह हैरत की बात नहीं कि आतंकवादी घटनाएं इतनी कम कैसे होती हैं। वैसे भी जब पोटा था , तब भी आतंकवाद था , जब नहीं है , तब भी आतंकवाद है।
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