मंगलवार, 24 सितंबर 2013

समारोह में बैरागी ने कविताओं का पाठ किया

राजधानी में हिंदी दिवस का आयोजन किया गया । इस अवसर पर हिंदी के सुपरिचित कवि बाल कवि बैरागी को सम्मानित किया गया। इस मौके पर उनके साहित्यिक और राजनैतिक जीवन के बारे में चर्चा भी हुई। 
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में टाइम्स ऑफ इंडिया और इंटरनैशनल मेलोडी फाउंडेशन के सहयोग से हुए इस समारोह में बैरागी ने कविताओं का पाठ किया। गिरिजा देवी की शिष्या ममता शर्मा ने भी कुछ प्रसिद्ध हिंदी कवियों की रचनाओं का गायन किया। 
समारोह में पूर्व लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़, भारी उद्योग मंत्रालय में सचिव ओ. पी. रावत और कई नामी हिंदी प्रेमी मौजूद थे। यह समारोह डीटीटीडीसी, एनबीसीसी, सिंडीकेट बैंक, ओएनजीसी, मोहम्मद यूनुस एजूकेशन ट्रस्ट, सेंट्रल वेयरहाउसिंग कारपोरेशन, एलआईसी, गेल और नेशनल हाउसिंग बैंक के सहयोग से किया गया। 

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

हिंदी का सौभाग्य है कि वो एक मुख्य भाषा बनकर आगे चल रही है

ये बात हर मौके पर उठकर आती है कि हिंदी गर्त में जा रही है , हिंदी बोलने वाले कम हो रहे हैं या हिंदी जानने वाले हिंदी बोलना ही नहीं चाहते ! कुछ सच्चाई तो है इन बातों में लेकिन पूर्ण सच्चाई नहीं है ! हर एक आदमी की मानसिकता अलग होती है , कोई हिंदी बोलना शान के खिलाफ समझता है , कोई इसे गरीबों की भाषा समझता है तो कोई इसे अभिव्यक्ति और सम्मान की भाषा समझता है ! ये सही है कि हमारे हिंदी के फिल्म अभिनेता ज्यादातर सार्वजनिक स्थानों पर अंग्रेजी में वार्तालाप करते हुए दीखते हैं लेकिन यही लोग हिंदी फिल्में पाने और अपना प्रचार करने के लिए हिंदी का प्रयोग करते हैं ! इसमें उन्हें दोष देना गलत है क्योंकि पेट सबसे बड़ी जरुरत है वो चाहे किसान का हो , मजदूर का हो या एक अभिनेता का हो ! लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जो हमेशा ही हिंदी को वरीयता देते हैं ! निश्चित ही सबसे पहला नाम महानायक अमिताभ बच्चन का आता है जो न केवल हिंदी बोलते हैं बल्कि बहुत शुद्ध और उच्चकोटि की हिंदी बोलते हैं ! मनोज वाजपायी , आशुतोष राणा की हिंदी से कौन वाकिफ नहीं है ? इसी दौर में प्रकाश झा जैसे डाइरेक्टर हिंदी को बढ़ावा देते हुए दीखते हैं ! और क्यूंकि हम सब जानते हैं कि हिंदी फिल्मों का बाज़ार दिनों दिन भारत से निकलकर श्री लंका और दुबई के रास्ते होते हुए यूरोप और जापान तक की गलियों में पहुँच रहा है , तो ऐसे में हिंदी का बोलबाला स्वतः ही दिखने लगता है ! कभी कभी हिंदी को लेकर दक्षिण में जो कुछ दिखाई देता है असल में वो असली नहीं है वो पैदा किया हुआ होता है ! क्यूंकि अगर वो पैदा नहीं होगा तो वोट बटोरने की मशीन ख़त्म हो जायेगी और मुझे ये गलत भी नहीं लगता ! गलत यानी कि ये की उन पर हिंदी थोपी जाए आखिर क्यूँ थोपी जाए दक्षिण में हिंदी हिंदी भारतीय भाषाओँ की बड़ी बहन जैसी है और मुझे लगता है उसे छोटी बहनों को भी प्यार करना चाहिए ! हिंदी , क्यूंकि बड़ी बहन है तो उसे और दूसरी भाषाओँ को भी सम्मान और उचित स्थान देना चाहिए ! हिंदी स्वयं में ही इतनी सुन्दर भाषा है कि लोग खिचे आते हैं ! मुझे उत्तर पूर्व में बहुत बार यात्रा करने का अवसर प्राप्त हुआ है लेकिन मुझे कभी भी ऐसी समस्या नहीं आई कि मैं अपनी बात हिंदी में उन लोगों को नहीं समझा सका ! हाँ , ये जरुर है कि ग्रामीण इलाकों में जरुर कुछ मुश्किल आती है किन्तु ऐसा तो हर जगह होता है ! आपको भोजपुरी समझने में दिक्कत हो सकती है , आपको राजस्थानी समझने में दिक्कत हो सकती है और यहाँ तक कि आपको हरियाणवी समझने में भी परेशानी हो सकती है लेकिन ये सब हिंदी के साथ चलती रहती हैं !

आज़ादी से पहले या आज़ादी के बाद भारत में जब जब सामाजिक आन्दोलन हुए हैं उनमें हिंदी को प्राथमिकता मिली है ! लोगों ने अपने विचार , अपने आन्दोलन , अपनी क्रांति को हिंदी के माध्यम से व्यक्त किया है ! भगत सिंह ने हमेशा पंजाबी और हिंदी में लिखा है ! लोहिया , राज नारायण जी से लेकर अन्ना हजारे तक ने अपनी अभिव्यक्ति को हिंदी में ही व्यक्त किया है और हिंदी ने ही इन आंदोलनों और क्रांतियों को सांस दी हैं और अपने उच्चतम शिखर तक गयी हैं ! इसलिए मुझे लगता है हिंदी में वो ताकत है जो किसी भी आन्दोलन और सामाजिक परिवर्तन को आगे लेकर जा सकती है ! हिंदी का सौभाग्य है कि वो एक मुख्य भाषा बनकर आगे चल रही है और मुझे भरोसा है कि एक दिन संयुक्त राष्ट्र महासभा में में भी जरुर हिंदी को आधिकारिक भाषा का सम्मान मिलेगा ! ये मिल सकता है अगर हम इसकी पैरवी प्रभावी तरीके से करें ! संयुक्त राष्ट्र महासभा में माननीय अटल बिहारी वाजपायी जी द्वारा दिया गया भाषण किसे याद नहीं है ? इसलिए हिंदी के लिए ये जरुरी हो जाता है कि उसकी हिमायत प्रभावी तरीके से हो ! हिंदी के प्रति कुछ शब्द काव्य के रूप में लिखकर आपसे विदा लेता हूँ :

मन समर्पित तन समर्पित और यह जीवन समर्पित
चाहता हूँ मातृ-भू तुझको अभी कुछ और भी दूँ ॥
माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिंचन
किन्तु इतना कर रहा फिर भी निवेदन
थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब
स्वीकार कर लेना दयाकर यह समर्पण
गान अर्पित प्राण अर्पित रक्त का कण-कण समर्पित ॥


माँज दो तलवार को लाओ न देरी
बाँध दो कसकर कमर पर ढाल मेरी
भाल पर मल दो चरण की धूलि थोड़ी
शीष पर आशीष की छाया घनेरी
स्वप्न अर्पित प्रश्न अर्पित आयु का क्षण-क्षण समर्पित ॥

शनिवार, 14 सितंबर 2013

हिन्दी भाषियों को हिदी दिवस की शुभकामनायें

हिन्दी ! भारत- माता के माथे की बिंदी ! सभी हिन्दी भाषियों को हिदी दिवस की शुभकामनायें ,एवं अहिन्दी भाषियों को हिन्दी भाषा अपनाने का आवाहन ! जय हिन्दी !

बुधवार, 14 अगस्त 2013

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें

आप सभी को एवं आपके परिवार को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें । 

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

हिंदी बोलने पर कड़ी सजा

 मध्य प्रदेश के दमोह जिले में अंग्रेजी मीडियम के स्कूल में पढ़ने वाली स्टूडेंट को हिंदी बोलने पर कड़ी सजा मिली है। टीचर ने स्टूडेंट को एक बार नहीं कई बार पीटा है। मामला डीएम के पास पहुंचा तो उन्होंने जांच के आदेश दे दिए हैं। वहीं, थाने में भी शिकायत दर्ज कराई गई है।
जानकारी के मुताबिक, अंग्रेजी मीडियम के स्कूल सेंट जॉन की क्लास 3 में पढ़ने वाली मानसी अपने साथियों से हिंदी में बातचीत कर रही थी। उसे हिंदी बोलता देख टीचर ने पिटाई कर दी। टीचर का कहना था कि स्कूल परिसर में हिंदी में बात करने की मनाही है।
मानसी ने जब यह बात अपने परिवार वालों को बताई तो वे डीएम स्वतत्र कुमार सिंह की जनसुनवाई में जा पहुंचे और हिंदी बोलने पर दंड दिए जाने की शिकायत की। सिंह ने इस मामले की जिला शिक्षाधिकारी एस.के. नीमा को जांच का जिम्मा सौंप दिया।

जिला शिक्षाधिकारी नीमा का कहना है कि वह इस प्रकरण की पूरी जांच कराएंगे। उन्होंने कहा कि स्कूल की मान्यता रद्द किए जाने तक की कार्रवाई हो सकती है। वहीं पीड़ित स्टूडेंट के परिवार वालों ने थाने में भी टीचर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है।

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

मोदी ने उर्दू समेत देश की सभी मुख्य क्षेत्रीय भाषाओं में ट्विटर अकाउंट बनाए

 बीजेपी की इलेक्शन कैंपेन कमिटी के चेयरमैन और गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी ने देश भर में पहुंच बनाने की कोशिशें तेज कर दी हैं। इसके लिए मोदी ने उर्दू समेत देश की सभी मुख्य क्षेत्रीय भाषाओं में ट्विटर अकाउंट बनाए हैं। 
ट्विटर पर इंग्लिश के अलावा अब नरेंद्र मोदी के हिंदी, उर्दू, कन्नड़, मराठी, मलयालम, उड़िया, तमिला और बांग्ला अकाउंट भी हैं। उर्दू में उन्होंने 9 ट्वीट किए हैं और इस हैंडल को 150 से ज्यादा लोग फॉलो कर रहे है। मोदी के मराठी अकाउंट के फॉलोअर्स की संख्या 400 से ज्यादा है। इन दोनों अकांउट्स के जरिए नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के लोगों के बीच पहुंचना चाहते है।
 
बीजेपी के कम्यूनिकेशन सेल के मुताबिक, 'अब हम लोगों तक क्षेत्रीय भाषाओं के जरिए पहुंच रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बहुत से लोग उर्दू पढ़ते-बोलते हैं। ऐसे में क्षेत्रीय भाषाओं के जरिए लोगों से जुड़ना असरदार रहेगा।'

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर और कथाकार विभूति नारायण - बातचीत के प्रमुख अंश:

मेरे लिए यह एक नई दुनिया थी। यद्यपि यह विश्वविद्यालय हिंदी भाषा और साहित्य से जुड़ा था और मैं हिंदी भाषा से प्यार करने वाला एक अदना लेखक था। इसके बावजूद सांस्थानिक पेचीदगियां तो होती ही हैं। शुरू में कुछ दिक्कतें तो जरूर हुईं। आकादमिक जगत के नियमों से निपटने के लिये मैं अपने साथ लखनऊ युनिवसिर्टी के प्रोफेसर नदीम हसनैन को प्रो वाइस चांसलर के रूप में लाया। इतना ही कह सकता हूं कि मैंने अपने कार्यकाल को भरपूर एंजॉय किया। मुझे बिना बिजली, पानी, सीवर, छात्रावासों और कक्षाओं वाले पांच टीले मिले थे, जिन पर आज गतिविधियों से भरपूर एक आवासीय विश्वविद्यालय फलता-फूलता देखा जा सकता है। मुझे संतोष है कि मैं अपनी भाषा के लिए कुछ कर सका।

यह विश्वविद्यालय कई अर्थों में विशिष्ट है। यह हिंदी को एक विश्व भाषा बनने के लिए आवश्यक उपकरण विकसित करने हेतु स्थापित होने वाला पहला विश्वविद्यालय है। शायद इसीलिए केंद्रीय विश्वविद्यालयों में केवल इसके नाम के साथ अंतरराष्ट्रीय शब्द जुड़ा है। महात्मा गांधी के आदर्शों और सपनों पर आधारित पाठ्यक्रमों जैसे शांति एवं अहिंसा, स्त्री अध्ययन तथा दलित एवं जनजाति अध्ययन जैसे पाठ्यक्रम प्रारंभ से ही यहां की शैक्षणिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण बने रहे। बाद में विकसित हुए नए पाठ्यक्रमों में भी इस बात का ध्यान रखा गया है कि यह अपनी मूल अवधारणा से भटकने न पाए।
केवल कहानी-कविता पढ़ाकर किसी भाषा का कल्याण नहीं हो सकता। एक विश्वभाषा बनने में हिंदी तभी समर्थ होगी जब उच्चतर ज्ञान के अनुशासनों को हिंदी माध्यम से न सिर्फ पढ़ाया जाए बल्कि हिंदी में इसके लिए आवश्यक स्तरीय पाठ्य सामग्री भी तैयार की जाए। इसी योजना के तहत मैंने संचयिता या साहित्य से जुड़ी पुस्तकों के प्रकाशन से अधिक समाजशास्त्रीय सामग्री के प्रकाशन पर जोर दिया। यहां बड़े पैमाने पर अनेक अनुशासनों की पाठ्य सामग्री तैयार हो रही है। मुझे आशा है कि बारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान कई अनुशासनों में हम यह लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे और तेरहवीं पंचवर्षीय योजना में यहां मेडिसिन, इंजीनियरिंग और कानून जैसे क्षेत्रों में हिंदी माध्यम से पढ़ने-पढ़ाने के बारे में योजनाएं बन सकती हैं।
देखिए, इस तथ्य को हमें सबसे पहले स्वीकार करना होगा कि भारत में शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य एक व्हाइट कॉलर जॉब हासिल करना है। आपको कोई विरला ही छात्र ऐसा मिलेगा जो विशुद्ध ज्ञान की प्राप्ति के लिए शिक्षा संस्थानों में आता है। इसलिए यह बहुत स्वाभाविक है कि माध्यमिक शिक्षा समाप्त करते ही छात्र एमबीए, इंजीनियरिंग या मेडिसिन जैसे क्षेत्रों की तरफ भागते हैं जहां कहीं अधिक वेतन वाले रोजगार मौजूद हैं । बचे खुचे छात्र ही अब समाज विज्ञान और प्योर साइंस जैसे क्षेत्रों में आते हैं। मुझे नहीं लगता कि इस दिशा में तब तक अधिक कुछ किया जा सकता है जब तक भारतीय समाज की संरचना में कोई बुनियादी परिवर्तन न आए।
जब हमने हिंदी माध्यम से एमबीए पढ़ाने का फैसला लिया तब यह शंका बहुत से लोगों के मन में थी कि हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले छात्रों को रोजगार कहां मिलेगा। पर नतीजा बहुत उत्साहजनक रहा। हमें यह याद रखना चाहिए कि हिंदी का सबसे बड़ा संबल आज का बाजार है। भारत का मध्य वर्ग यूरोप की कुल आबादी से बड़ा है और यह एक विशाल उपभोक्ता समूह है। उपभोक्ताओं का यह समूह अब सिर्फ महानगरों तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि टायर टू-थ्री शहरों से होता हुआ कस्बों और गांवों तक फैल गया है। दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारतीय बाजारों में अपना हिस्सा तलाश रहीं हैं। उनके बिजनेस प्रतिनिधियों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे उपभोक्ताओं से उनकी भाषा में संवाद करें। और इसीलिए उनके लिए अब यह जरूरी है वे कम से कम एक भारतीय भाषा जानें। जाहिर है कि हिंदी इस स्थिति में पहली प्राथमिकता होगी क्योंकि आधा भारत उसे बोलता है। और शेष में भी आप इस भाषा के माध्यम से संवाद कायम कर सकते हैं। शायद यही कारण है कि हमारे विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में चीन तथा विभिन्न यूरोपीय देशों से छात्र हिंदी पढ़ने आ रहें हैं। हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले छात्रों को बहुराष्ट्रीय और देशी कंपनियां ग्रामीण क्षेत्रों में अपने विस्तार के लिए प्रयोग कर रही हैं।