सार्क देशों का
भाषा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काफी सुनहरा भविष्य है। कंप्यूटिंग टेक्नॉलजी
में लोगों की रुचि काफी बढ़ी है। पीसी और इंटरनेट का तेजी से विस्तार आफिस तक ही
सीमित नहीं। यह घर-घर तक पहुंच चुका है। लोगों में आगे बढ़ने और नई तकनीक अपनाने
की ललक दिखाई देती है। मुझे विश्वास है कि निरंतर विकास करती हमारी टेक्नॉलजी
सार्क देशों को अपनी भाषा के प्रसार के लिए नई दिशा प्रदान करती रहेगी। इस स्थिति
को और विकसित करने एवं बढ़ाने की आवश्यकता है। सार्क देशों में कंप्यूटर और उसके
प्रयोग की असीम संभावनाएं हैं। बहुत सारी पुस्तकें, पत्रिकाएं ऑडियो प्रशिक्षण सामग्री तथा प्रशिक्षण केंद्र का विस्तार
किया जाना चाहिए
शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012
सोमवार, 8 अक्टूबर 2012
बदलाव का विरोध वही करते हैं जो भाषा को अपनी जागीर समझते हैं,
हिंदी प्रेमियों को
इसकी अपनी लिपि, अपने शब्द और
इसके व्याकरण वगैरह पर एक हद से ज्यादा जोर नहीं देना चाहिए। अगर हिंदी फैलती है,
इसका दायरा व्यापक बनता है तो इन सब में बदलाव आना लाजिमी है।
बदलाव का विरोध वही करते हैं जो भाषा को अपनी जागीर समझते हैं, जबकि कोई भाषा किसी की निजी संपत्ति नहीं बनी रह सकती। यह उन सब की
साझा संपत्ति होती है, जो उससे जुड़े होते हैं। इस तर्क
से सहमत होते हुए भी कुछ सवाल मेरे मन में रह गए थे। शायद इसलिए कि मैं भी उन
लोगों में हूं, जो हिंदी के साथ भावनात्मक तौर पर जुड़े
हैं। मगर हाल में मैंने एक अंग्रेजी दैनिक में जस्टिस मार्कंडेय काटजू की एक
टिप्पणी देखी, जो कि नीचे प्रस्तुत है ।
कुछ समय पहले जस्टिस काटजू ने चेन्नै के किसी आयोजन में अपने भाषण में तमिलभाषियों के हिंदी सीखने की जरूरत पर बल दिया था। इसका वहां कुछ लोगों ने विरोध किया। जस्टिस काटजू ने उन्हीं विरोधियों के तर्कों का जवाब देने के लिए अखबार में यह टिप्पणी लिखी थी। इसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि वह तमिलनाडु ही नहीं, कहीं भी किसी पर भी हिंदी थोपने के खिलाफ हैं और नहीं मानते कि हिंदी भाषा तमिल से बेहतर है। वे हर भाषा का समान आदर करते हैं, किसी को ऊपर या नीचे नहीं रखते। उनके मुताबिक तमिल की हिंदी से तुलना नहीं की जा सकती इसलिए नहीं कि हिंदी बेहतर है, बल्कि इसलिए कि हिंदी कहीं ज्यादा व्यापक है। तमिल सिर्फ तमिलनाडु में बोली जाती है, जिसकी आबादी 7.2 करोड़ है। जबकि हिंदी न केवल हिंदी भाषी इलाकों में, बल्कि गैर हिंदी भाषी राज्यों में भी दूसरी भाषा के रूप में इस्तेमाल होती है। हिंदी भाषी राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश में 20 करोड़, बिहार में 8.2 करोड़, मध्य प्रदेश में 7.5 करोड़, राजस्थान में 6.9 करोड़, झारखंड में 2.7 करोड़, छत्तीसगढ़ में 2.6 करोड़, हरियाणा में 2.6 करोड़ और हिमाचल प्रदेश में 70 लाख लोग हिंदी बोलते हैं। अगर पंजाब, प. बंगाल और असम जैसे गैर हिंदी भाषी राज्यों के हिंदीभाषियों को जोड़ लिया जाए, तो संख्या तमिल भाषियों के मुकाबले 15 गुनी ज्यादा हो जाती है। तमिल एक क्षेत्रीय भाषा है जबकि हिंदी राष्ट्रभाषा है और इसकी वजह यह नहीं कि हिंदी तमिल के मुकाबले बेहतर है। इसके पीछे कुछ ऐतिहासिक और सामाजिक कारण हैं।
कहते हैं इंग्लिश पूरे देश की संपर्क भाषा है, मगर नहीं। इंग्लिश एलीट तबके की संपर्क भाषा हो सकती है, आम लोगों की नहीं। जस्टिस काटजू ने इस संदर्भ में एक घटना का जिक्र किया है। जब वह मद्रास हाई कोर्ट के जज थे, एक दिन उन्होंने एक दुकानदार को फोन पर हिंदी में बात करते सुना। उसके फोन रखने पर जस्टिस काटजू ने तमिल में उससे पूछा कि वह इतनी अच्छी हिंदी कैसे बोल लेता है? दुकानदार ने जवाब दिया, नेता कहते हैं हमें हिंदी नहीं चाहिए पर हमें बिजनस करना है, इसलिए मैंने हिंदी सीख ली है। जस्टिस काटजू का यह अनुभव पढ़कर मुझे भी लगता है कि तमिलनाडु के हिंदी विरोधी और इलाहाबाद, वाराणसी के विशुद्ध हिंदी का आग्रह पालने वाले हिंदी समर्थक अनजाने में एक ही पाले में खड़े हैं। अगर तमिलनाडु के लोग हिंदी को अपनाएंगे तो क्या वे उसमें तमिल के प्रचलित शब्द नहीं डालेंगे? क्या उनका प्रयोग और उच्चारण वगैरह बिलकुल वैसा ही होगा, जैसा उत्तर प्रदेश या बिहार के लोगों का होता है? साफ है कि ऐसा नहीं होगा। वह एक नए तरह की हिंदी होगी, जो शायद यूपी और एमपी के लोगों को थोड़ी अजीब लगे। जैसी कि मुंबइया हिंदी लगती है, लेकिन वह होगी हिंदी ही। क्या हम देश-विदेश में जन्म ले रही, फल-फूल रही ऐसी तमाम हिंदियों को अपना मानने की उदारता नहीं दिखा सकते?
कुछ समय पहले जस्टिस काटजू ने चेन्नै के किसी आयोजन में अपने भाषण में तमिलभाषियों के हिंदी सीखने की जरूरत पर बल दिया था। इसका वहां कुछ लोगों ने विरोध किया। जस्टिस काटजू ने उन्हीं विरोधियों के तर्कों का जवाब देने के लिए अखबार में यह टिप्पणी लिखी थी। इसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि वह तमिलनाडु ही नहीं, कहीं भी किसी पर भी हिंदी थोपने के खिलाफ हैं और नहीं मानते कि हिंदी भाषा तमिल से बेहतर है। वे हर भाषा का समान आदर करते हैं, किसी को ऊपर या नीचे नहीं रखते। उनके मुताबिक तमिल की हिंदी से तुलना नहीं की जा सकती इसलिए नहीं कि हिंदी बेहतर है, बल्कि इसलिए कि हिंदी कहीं ज्यादा व्यापक है। तमिल सिर्फ तमिलनाडु में बोली जाती है, जिसकी आबादी 7.2 करोड़ है। जबकि हिंदी न केवल हिंदी भाषी इलाकों में, बल्कि गैर हिंदी भाषी राज्यों में भी दूसरी भाषा के रूप में इस्तेमाल होती है। हिंदी भाषी राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश में 20 करोड़, बिहार में 8.2 करोड़, मध्य प्रदेश में 7.5 करोड़, राजस्थान में 6.9 करोड़, झारखंड में 2.7 करोड़, छत्तीसगढ़ में 2.6 करोड़, हरियाणा में 2.6 करोड़ और हिमाचल प्रदेश में 70 लाख लोग हिंदी बोलते हैं। अगर पंजाब, प. बंगाल और असम जैसे गैर हिंदी भाषी राज्यों के हिंदीभाषियों को जोड़ लिया जाए, तो संख्या तमिल भाषियों के मुकाबले 15 गुनी ज्यादा हो जाती है। तमिल एक क्षेत्रीय भाषा है जबकि हिंदी राष्ट्रभाषा है और इसकी वजह यह नहीं कि हिंदी तमिल के मुकाबले बेहतर है। इसके पीछे कुछ ऐतिहासिक और सामाजिक कारण हैं।
कहते हैं इंग्लिश पूरे देश की संपर्क भाषा है, मगर नहीं। इंग्लिश एलीट तबके की संपर्क भाषा हो सकती है, आम लोगों की नहीं। जस्टिस काटजू ने इस संदर्भ में एक घटना का जिक्र किया है। जब वह मद्रास हाई कोर्ट के जज थे, एक दिन उन्होंने एक दुकानदार को फोन पर हिंदी में बात करते सुना। उसके फोन रखने पर जस्टिस काटजू ने तमिल में उससे पूछा कि वह इतनी अच्छी हिंदी कैसे बोल लेता है? दुकानदार ने जवाब दिया, नेता कहते हैं हमें हिंदी नहीं चाहिए पर हमें बिजनस करना है, इसलिए मैंने हिंदी सीख ली है। जस्टिस काटजू का यह अनुभव पढ़कर मुझे भी लगता है कि तमिलनाडु के हिंदी विरोधी और इलाहाबाद, वाराणसी के विशुद्ध हिंदी का आग्रह पालने वाले हिंदी समर्थक अनजाने में एक ही पाले में खड़े हैं। अगर तमिलनाडु के लोग हिंदी को अपनाएंगे तो क्या वे उसमें तमिल के प्रचलित शब्द नहीं डालेंगे? क्या उनका प्रयोग और उच्चारण वगैरह बिलकुल वैसा ही होगा, जैसा उत्तर प्रदेश या बिहार के लोगों का होता है? साफ है कि ऐसा नहीं होगा। वह एक नए तरह की हिंदी होगी, जो शायद यूपी और एमपी के लोगों को थोड़ी अजीब लगे। जैसी कि मुंबइया हिंदी लगती है, लेकिन वह होगी हिंदी ही। क्या हम देश-विदेश में जन्म ले रही, फल-फूल रही ऐसी तमाम हिंदियों को अपना मानने की उदारता नहीं दिखा सकते?
सोमवार, 24 सितंबर 2012
शपथ समारोह में संसद में बहुत से नेताओं ने अँग्रेज़ी में शपथ ग्रहण
ये मैं नहीं कहता| ये कहते हैं आज के हालत| जानना चाहेंगे कैसे? तो शुरुआत करते हैं हमारे आसपास के माहौल से| आज दिल्ली में कितने माँ बाप होंगे जो
अपने बच्चे का दाखिला हिन्दी मध्यम के विधयालयों मे करना पसंद करेंगे? बहुत कम या फिर ना के बराबर|
इसकी वजह साफ है| कोई भी अभिभावक अपने बच्चे के भविष्य से खेलना नहीं चाहेगा| जिस भाषा का अपना भविष्य ख़तरे मे है वो भाषा किसी का क्या उद्धार कर पाएगी| इसमें हमारी हिन्दी भाषा का दोष नहीं है| ये दोष है हमारी सोच का|
मैं आजतक भारत की आज़ादी के भाषण का हिन्दी अनुवाद डूंड रहा हूँ| जिस देश की आबादी का 80% से ज़्यादा लोगों को अँग्रेज़ी नहीं आती थी उन्हें भी अपनी आज़ादी का संदेश अँग्रेज़ी में सुनना पड़ा| या फिर में ग़लत हूँ| क्यों की मैने जब भी नेहरू जी को सुना टी वी या रेडियो के ज़रिए आज़ादी का भाषण अँग्रेज़ी में सुनाई दिया|
इस बार के शपथ समारोह में संसद में बहुत से नेताओं ने अँग्रेज़ी में शपथ ग्रहण की| इनमे से बहुत से ऐसे थे जो वोट माँगते वक़्त खालिस हिन्दी का प्रयोग कर रहे थे| क्यों भाई जिस भाषा ने वोट दिलाए उसी भाषा में आपको शपथ लेने में क्या शर्मिंदगी महसूस हो रही थी|
नेता हुए अब आते हैं अभिनेताओं की ओर| ऐसे कितने अभिनेता हैं जिन्होने नाम और शोहरत तो हिन्दी फिल्मों से कमाई| मगर जब जब इन्हे समारोहों में बोलने का मौका दिया गया, ये यकायक हिन्दी भूल गए| या फिर शर्म आती है इन्हें भी हिन्दी में अभिवादन करने में|
पिछले ही वर्ष एक अख़बार में पढ़ा कॉलेज के कुछ छात्रों ने कहा अँग्रेज़ी की गाली भी बहुत कूल लगती है मगर कोई हिन्दी में प्यार का इज़हार भी करे तो गाली लगती है|
भारत की राजधानी दिल्ली की ही बात करें तो यहाँ हर चीज़ जो बिकती है उसमे हिन्दी दूर दूर तक नज़र नहीं आती| अभी हाल ही में मैने धौला कुआँ के मेट्रो स्टेशन के नाम को देखा यहाँ अँग्रेज़ी में उप्पर और हिन्दी को नीचला स्तर दिया गया था| कम से कम जगहों के नाम पहले हिन्दी में फिर किसी और भाषा में लिखे जाते थे| और फिर आइ टी ओ में पुलिस मुख्यालय बड़े बड़े अक्षरों मे लिखा गया है हिन्दी में नहीं अँग्रेज़ी में| मैने इस बात की शिकायत मंत्रालया को की है देखते हैं सरकार क्या कदम उठाती है|
14 सितंबर जिसे हमारी सरकार हिन्दी दिवस के नाम से मनाती है| इसी अवसर पर मेरी तरफ से ये भेंट स्वीकार करे
इसकी वजह साफ है| कोई भी अभिभावक अपने बच्चे के भविष्य से खेलना नहीं चाहेगा| जिस भाषा का अपना भविष्य ख़तरे मे है वो भाषा किसी का क्या उद्धार कर पाएगी| इसमें हमारी हिन्दी भाषा का दोष नहीं है| ये दोष है हमारी सोच का|
मैं आजतक भारत की आज़ादी के भाषण का हिन्दी अनुवाद डूंड रहा हूँ| जिस देश की आबादी का 80% से ज़्यादा लोगों को अँग्रेज़ी नहीं आती थी उन्हें भी अपनी आज़ादी का संदेश अँग्रेज़ी में सुनना पड़ा| या फिर में ग़लत हूँ| क्यों की मैने जब भी नेहरू जी को सुना टी वी या रेडियो के ज़रिए आज़ादी का भाषण अँग्रेज़ी में सुनाई दिया|
इस बार के शपथ समारोह में संसद में बहुत से नेताओं ने अँग्रेज़ी में शपथ ग्रहण की| इनमे से बहुत से ऐसे थे जो वोट माँगते वक़्त खालिस हिन्दी का प्रयोग कर रहे थे| क्यों भाई जिस भाषा ने वोट दिलाए उसी भाषा में आपको शपथ लेने में क्या शर्मिंदगी महसूस हो रही थी|
नेता हुए अब आते हैं अभिनेताओं की ओर| ऐसे कितने अभिनेता हैं जिन्होने नाम और शोहरत तो हिन्दी फिल्मों से कमाई| मगर जब जब इन्हे समारोहों में बोलने का मौका दिया गया, ये यकायक हिन्दी भूल गए| या फिर शर्म आती है इन्हें भी हिन्दी में अभिवादन करने में|
पिछले ही वर्ष एक अख़बार में पढ़ा कॉलेज के कुछ छात्रों ने कहा अँग्रेज़ी की गाली भी बहुत कूल लगती है मगर कोई हिन्दी में प्यार का इज़हार भी करे तो गाली लगती है|
भारत की राजधानी दिल्ली की ही बात करें तो यहाँ हर चीज़ जो बिकती है उसमे हिन्दी दूर दूर तक नज़र नहीं आती| अभी हाल ही में मैने धौला कुआँ के मेट्रो स्टेशन के नाम को देखा यहाँ अँग्रेज़ी में उप्पर और हिन्दी को नीचला स्तर दिया गया था| कम से कम जगहों के नाम पहले हिन्दी में फिर किसी और भाषा में लिखे जाते थे| और फिर आइ टी ओ में पुलिस मुख्यालय बड़े बड़े अक्षरों मे लिखा गया है हिन्दी में नहीं अँग्रेज़ी में| मैने इस बात की शिकायत मंत्रालया को की है देखते हैं सरकार क्या कदम उठाती है|
14 सितंबर जिसे हमारी सरकार हिन्दी दिवस के नाम से मनाती है| इसी अवसर पर मेरी तरफ से ये भेंट स्वीकार करे
बुधवार, 12 सितंबर 2012
राजभाषा विभाग का गठन हिन्दी को राजभाषा के रूप मे विकसित करने और उसका इस्तेमाल सरकारी कार्यालयों मे बढ़ाने के लिए किया गया
कल हिन्दी दिवस है । इस दिन अनेकानेक सरकारी कार्यालयों मे हिन्दी के
कार्यक्रम होंगे । प्रश्न है कि क्या अब राजभाषा विभाग को वास्तविकता मे हिन्दी को राजभाषा बनाने के लिए कदम उठाने चाहिए
। यह कहना गलत नहीं होगा कि इस दिन अनेकानेक सरकारी कार्यालयों मे हिन्दी के कार्यक्रम
हिन्दी का साहित्य रूप प्रदर्शित करते है । राजभाषा विभाग का गठन हिन्दी को राजभाषा
के रूप मे विकसित करने और उसका इस्तेमाल सरकारी कार्यालयों मे बढ़ाने के लिए किया गया
था लेकिन आज सरकारी कार्यालयों मे यह नहीं हो रहा है । इसका आडिट होना चाहिए ।
शुक्रवार, 7 सितंबर 2012
आज यहां हम जिस हिंदी बनाम अंग्रेजी की बहस में उलझे हुए हैं
भाषाओं
का संसार बेहद रोचक है। आज यहां हम जिस हिंदी बनाम अंग्रेजी की बहस में उलझे हुए हैं, ये दोनों मूलरूप से एक ही परिवार की सदस्य हैं। हिंदी,
रूसी, जर्मन और अंग्रेजी- ये सभी
भारतीय-यूरोपीय परिवार की भाषाएं मानी जाती हैं, क्योंकि
इनका जन्म एक साथ हुआ है। हालांकि इनके जन्मस्थान को लेकर विवाद रहा है।
पिछले दिनों इस संबंध में एक नई बात सामने आई है, जो वर्तमान धारणा से अलग है। यूनिवसिर्टी ऑफ ऑकलैंड (न्यूजीलैंड) के जीव विज्ञानी क्वेंटीन एटकिंसन के नेतृत्व में कुछ रिसर्चरों ने एक शोध किया है, जिसके मुताबिक भारतीय-यूरोपीय भाषाओं का जन्म एंटोलिया में हुआ था, जिसे आज तुर्की कहा जाता है। इन रिसर्चरों का कहना है कि करीब 8000 से 9500 साल पहले यहीं से ये सभी भाषाएं पूरी दुनिया में फैलीं। इस स्टडी के लिए एटकिंसन की टीम ने कंप्यूटेशनल तकनीक का सहारा लिया। उन्होंने बीमारियों के प्रसार का अध्ययन करने के साथ 103 प्राचीन और समकालीन भारोपीय भाषाओं की मूल शब्दावली का तुलनात्मक अध्ययन किया। इस अध्ययन में उन्होंने पाया कि अंग्रेजी, स्पेनिश, रूसी, ग्रीक और हिंदी के अनेक शब्द भले ही अलग-अलग सुनाई देते हों, लेकिन इनमें कई समानताएं हैं। जैसे मदर शब्द को जर्मन में मुटर, रूसी में मैट, फारसी में मादर और हिंदी में मातृ कहते हैं। इन सभी का आपस में संबंध है। ये सभी मूल भारोपीय शब्द मेहटर से विकसित हुए हैं।
इसके पहले भाषा विज्ञानियों की मान्यता यह रही है कि भारतीय-यूरोपीय भाषाएं आज से 6000 साल पहले स्टेपीज में विकसित हुईं, जो आज का रूस है। इसके पीछे दलील यह रही है कि चक्के और गाड़ी के लिए इन सभी भाषाओं में एक ही जैसे शब्द हैं। ऐसा इसलिए है कि उस क्षेत्र में रथ या उस जैसी एक गाड़ी तब तक बनाई जा चुकी थी। भाषा विज्ञानी मानते हैं कि स्टेपीज में रहने वाले लोग पशुपालक थे। वे चारे और पानी की तलाश में अपने मूल स्थान से दूसरे क्षेत्रों की ओर बढ़े। और करीब चार हजार साल पहले यूरोप और एशिया के मूल निवासियों पर जीत हासिल कर वहीं बस गए। पर एटकिंसन की थ्योरी के मुताबिक नौ हजार साल पहले भारतीय-यूरोपीय भाषाएं बोलने वाले एंटोलिया के लोग शांतिप्रिय किसान थे, जो खेती का प्रसार करते हुए दुनिया भर में फैले, युद्ध करते हुए नहीं। लगता है, भाषा के जन्म को लेकर चलने वाला विवाद फिलहाल तो खत्म नहीं होने वाला
पिछले दिनों इस संबंध में एक नई बात सामने आई है, जो वर्तमान धारणा से अलग है। यूनिवसिर्टी ऑफ ऑकलैंड (न्यूजीलैंड) के जीव विज्ञानी क्वेंटीन एटकिंसन के नेतृत्व में कुछ रिसर्चरों ने एक शोध किया है, जिसके मुताबिक भारतीय-यूरोपीय भाषाओं का जन्म एंटोलिया में हुआ था, जिसे आज तुर्की कहा जाता है। इन रिसर्चरों का कहना है कि करीब 8000 से 9500 साल पहले यहीं से ये सभी भाषाएं पूरी दुनिया में फैलीं। इस स्टडी के लिए एटकिंसन की टीम ने कंप्यूटेशनल तकनीक का सहारा लिया। उन्होंने बीमारियों के प्रसार का अध्ययन करने के साथ 103 प्राचीन और समकालीन भारोपीय भाषाओं की मूल शब्दावली का तुलनात्मक अध्ययन किया। इस अध्ययन में उन्होंने पाया कि अंग्रेजी, स्पेनिश, रूसी, ग्रीक और हिंदी के अनेक शब्द भले ही अलग-अलग सुनाई देते हों, लेकिन इनमें कई समानताएं हैं। जैसे मदर शब्द को जर्मन में मुटर, रूसी में मैट, फारसी में मादर और हिंदी में मातृ कहते हैं। इन सभी का आपस में संबंध है। ये सभी मूल भारोपीय शब्द मेहटर से विकसित हुए हैं।
इसके पहले भाषा विज्ञानियों की मान्यता यह रही है कि भारतीय-यूरोपीय भाषाएं आज से 6000 साल पहले स्टेपीज में विकसित हुईं, जो आज का रूस है। इसके पीछे दलील यह रही है कि चक्के और गाड़ी के लिए इन सभी भाषाओं में एक ही जैसे शब्द हैं। ऐसा इसलिए है कि उस क्षेत्र में रथ या उस जैसी एक गाड़ी तब तक बनाई जा चुकी थी। भाषा विज्ञानी मानते हैं कि स्टेपीज में रहने वाले लोग पशुपालक थे। वे चारे और पानी की तलाश में अपने मूल स्थान से दूसरे क्षेत्रों की ओर बढ़े। और करीब चार हजार साल पहले यूरोप और एशिया के मूल निवासियों पर जीत हासिल कर वहीं बस गए। पर एटकिंसन की थ्योरी के मुताबिक नौ हजार साल पहले भारतीय-यूरोपीय भाषाएं बोलने वाले एंटोलिया के लोग शांतिप्रिय किसान थे, जो खेती का प्रसार करते हुए दुनिया भर में फैले, युद्ध करते हुए नहीं। लगता है, भाषा के जन्म को लेकर चलने वाला विवाद फिलहाल तो खत्म नहीं होने वाला
गुरुवार, 23 अगस्त 2012
राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय
राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय
एनडीसीसी-II (नई दिल्ली सिटी सैंटर) भवन, 'बी' विंग
चौथा तल, जय सिंह रोड़
नई दिल्ली - 11000
एनडीसीसी-II (नई दिल्ली सिटी सैंटर) भवन, 'बी' विंग
चौथा तल, जय सिंह रोड़
नई दिल्ली - 11000
गुरुवार, 2 जून 2011
संसदीय राजभाषा समिति ने आज दिनांक 1 जून को महामहिम राष्ट्रपति जी से भेंट कर उन्हे अपनी सिफारिशो का 9 वां खण्ड सौंप दिया
संसदीय राजभाषा समिति ने आज दिनांक 1 जून को महामहिम राष्ट्रपति जी से भेंट कर उन्हे अपनी सिफारिशो का 9 वां खण्ड सौंप दिया ।
ज्ञातव्य है कि इस खण्ड में राजभाषा के रूप में हिन्दी के प्रसार प्रयोग को सरकारी कार्यालयों में बढाने के लिए अनेक उपाय सुझाए गए है साथ ही साथ भाषा को सरकारी आदेशो और साथ ही साथ स्वयं सेवी संगठनों की सहायता लेकर चलने की बात पर जोर दिया गया है ।हिन्दी कंप्यूटिंग फाउण्डेशन के बारे में संसदीय राजभाषा समिति ने अपने इस खण्ड में महामहिम राष्ट्रपति जी से संस्तुति की है जो कि महामहिम राष्ट्रपति जी ने स्वीकार कर ली है अब देखना यह है कि इन संस्तुतियों पर राजभाषा विभाग कब तक आदेश जारी करता है ।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
