बुधवार, 16 सितंबर 2009

राजभाषा को खूंटी पर टांग रहे है राजभाषा कर्मी, बधाई

बडे सौभाग्य की बात है कि आज भी भारत जैसे देश की कोई राजभाषा नहीं है यदि है तो केवल कागजों पर, जिन लोगों ने यह स्वप्न संजोये थे कि हिन्दुस्तानी भारत की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो , यदि आज की तस्वीर को देखते जो कि बदलते परिवेश के कारण हो गई है तो शायद वे अपनी करनी पर पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ और नहीं सोचते । आज भारत देश के सभी राजभाषा कर्मी राजभाषा सप्ताह मना रहे है और कविता , भाषण यहां तक कि हिन्दी के नाम पर पाक प्रतियोगिताएं भी करा रहे हैं । यह भी केवल इसी माह तक सीमित रहेगा । भारत सरकार के मंत्रालयों से संदेश आते है कि इन्हे पढा जाए और इनपर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए । बस उनका काम यहीं तक सीमित है वे केवल सुनिश्चित करने को लिखा सकते है सुनिश्चित करा नहीं सकते क्योंकि वे स्वयं बदलते परिवेश के कारण हुए बदलाव में ढल नहीं पाए है आज भी अनेकानेक कार्यालयों में हिन्दी कर्मी कंप्यूटर नहीं सीख पाए है तो किस ताकत पर वे कंप्यूटरों पर राजभाषा के रूप में हिन्दी सुनिश्चित करा सकते है । आज हमारा मत है कि हिन्दी को राजभाषा कर्मियों से भगवान बचाए , शायद भारत का जनमानस अपनी भाषाओं को अपना ले । मुझे बहुत अच्छा लगा कि तमिल के एक केन्द्रीय मंत्री ने स्पष्ट कहा कि मुझे संसद में तमिल में बोलने की छूट होनी चाहिये यह स्वागत योग्य है कम से कम इसी तरह भारतीय भाषाओं का भविष्य तो अंधकारमय नही रहेगा ।

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

हिन्दी मठाधीशों को प्रणाम करता हूं

हिन्दी को राजभाषा के रूप में अपनाना चाहिये, केवल दिवस मनाने से कोई अर्थ नहीं, अब समय आ गया है कि सरकारी दफ्तरों से हिन्दी अफसर नाम का मठाधीश हटा दिया जाए और हिन्दी को अपने आप फलने फूलने दिया जाए ।
भारत को आजाद हुए 63 साल बीत गए, कई सरकार आई और कई गई, वही ढाक के तीन पात, भारत को अभी तक अपनी भाषा नहीं मिल पाई ।सारे भारत में केन्द्रीय सरकारी कार्यालयों मे राजभाषा सप्ताह, राजभाषा दिवस, और यहां तक कि राजभाषा माह मनाए जा रहे है । वही पुरानी ढर्रे की प्रतियोगिताएं, वही पुराने संदेश, और वही पुराने ढंग । न कुछ बदला है और न ही कुछ बदलेगा । हिन्दी विभाग में बैठक हिन्दी अधिकारी वही पुराने ढंग से अपने अपने राग अलापते रहेंगे और एक प्रतीकात्मक कार्य अपने ढंग से करते रहेगे ।
आज के बदलते युग में वैश्विक सोच, उसे कार्यान्वन करने के लिए उपयुक्त ज्ञान की आवश्यकता है जो कि आज के तथाकथित हिन्दी अफसरों के पास नहीं है बहुत से मेरे साथी है जिन्हे आज भी कंप्यूटर चलाना नहीं आता और इस 14 सितम्बर 2009 को उन्हें इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार मिल गया है । मैं इस प्रकार के हिन्दी मठाधीशों को प्रणाम करता हूं और भगवान से प्रार्थना करता हूं कि मेरे भारत को इस प्रकार के मठाधीशों से बचाए ।

बुधवार, 9 सितंबर 2009

बेचारे अनाथ राजभाषा कर्मी (अधीनस्थ कार्यालयों के)

भारत के संविधान की धारा 343 में कहा गया है कि भारत के संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में हिन्दी होगी और भारतीय अंकों का अन्तर्राष्ट्रीय रूप प्रयोग में लाया जाएगा । भारत के संघ की राजभाषा हिन्दी को भारत के संघ में लागू करने के लिए राष्ट्रपति जी ने आदेश जारी किए, राजभाषा अधिनियम और राजभाषा नियम बना । इन्हें सरकारी तंत्र में लागू करने के लिए विभिन्न सरकारी कार्यालयों में हिन्दी अधिकारी, वरिष्ठ हिन्दी अधिकारी, हिन्दी अनुवादक श्रेणी -I अथवा वरिष्ठ अनुवादक तथा हिन्दी अनुवादक श्रेणी -II अथवा कनिष्ठ अनुवादक भर्ती किए गए । चूंकि मंत्रालयों और उनके विभागों का स्वरूप अपेक्षाकृत बड़ा होता था, वहाँ वरिष्ठ हिन्दी अधिकारी, हिन्दी अधिकारी, वरिष्ठ अनुवादक तथा कनिष्ठ अनुवादक के पद होते थे । किंतु संबद्ध एवं अधीनस्थ कार्यालयों को स्वरूप कुछ छोटा होता था वहाँ हिन्दी अधिकारी, वरिष्ठ अनुवादक (अधीनस्थ कार्यालयों में हिन्दी अनुवादक श्रेणी -I) तथा कनिष्ठ अनुवादक (अधीनस्थ कार्यालयों में हिन्दी अनुवादक श्रेणी II) के पद सृजित किए गए ।

मंत्रालयों, विभागों और संबद्ध कार्यालयों के राजभाषा संबंधी पदों में पदोन्नति के अधिक अवसर सृजित करने के लिए, अन्य केद्रीय सिविल सेवा संवर्गों की तर्ज पर, 1983-84 में केद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा संवर्ग का गठन किया गया । अधीनस्थ कार्यालयों को यह कह कर इस संवर्ग में शामिल नहीं किया कि निकट भविष्य में अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा संबंधी पदों को भी इस संवर्ग में शामिल किया जाएगा । किन्तु वह निकट भविष्य 25-26 वर्ष बाद आज भी नहीं आया । संवर्ग से पहले हिन्दी अधिकारी का वेतनमान 650-1200 होता था, वरिष्ठ अनुवादक और कनिष्ठ अनुवादक के वेतनमान क्रमश: 550-900 और 425-640 या 425-700 होते थे । अधीनस्थ कार्यालयों के हिन्दी अनुवादक श्रेणी I और हिन्दी अनुवादक श्रेणी II के वेतनमान क्रमश: 550-800 और 425-640 होते थे । सभी समकक्ष पदों की शैक्षणिक योग्यताएँ, कर्तव्य आदि समान होने पर भी मंत्रालयों, विभागों और संबद्ध कार्यालयों के राजभाषा पदों को अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा पदों से अकारण ही ऊंचा माना गया था ।

चौथे वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार सहायक निदेशक (राजभाषा) / हिन्दी अधिकारी का वेतनमान रू. 2000-3500, वरिष्ठ अनुवादक का रू. 1640-2900 और कनिष्ठ अनुवादक का वेतनमान रू. 1400-2600 निर्धारित किया गया । अधीनस्थ कार्यालयों के हिन्दी अनुवादक श्रेणी I को रू. 1640-2900 और हिन्दी अनुवादक श्रेणी II को 1400-2600 का वेतनमान दिया गया ।

पाँचवे वेतन आयोग की स्वीकृत सिफारिशों में हिन्दी अधिकारी / सहायक निदेशक (राजभाषा) को रू. 6500-200-10500 का, वरिष्ठ अनुवादक / हिन्दी अनुवादक श्रेणी I को रू. 5500-175-9000 का तथा कनिष्ठ अनुवादक / हिन्दी अनुवादक श्रेणी II क ाट रू. 5000-150-8000 का वेतनमान प्रदान किया गया । यहाँ तक सब ठीक-ठाक था । किन्तु क टद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा संवर्ग के सदस्यों को निदेशक (राजभाषा) के स्तर तक पदोन्नति के अवसर प्राप्त थे तो अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मी जिस पद पर भर्ती होते थे उसी पद पर सेवा निवृत्त होने या मृत्यु को प्राप्त हेने को विवश थे । के.सचि.रा.भा.से.संवर्ग के सदस्यों का एक मंत्रालय से दूसरे मंत्रालय में स्थानांतरण संभव था किन्तु अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मी एक अधीनस्थ कार्यालय में जा तो सकते थे, अपने प्रधान कार्यालय या मंत्रालय / विभाग में नहीं जा सकते थे । पदोन्नति के अवसर निर्माण करने हेतु अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मियों ने विभिन्न राजभाषा सम्मेलनों, बैठकों, सभाओं आदि में राजभाषा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से अनुरोध किया कि अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मियों को भी केद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा संवर्ग में शामिल किया जाए । किन्तु राजभाषा विभाग के सक्षम अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी । परिणामस्वरूप, अधीनस्थ कार्यालयों के अधिकतर राजभाषा संबंधी पदों को आइसोलेटिड पोस्ट बताकर एसीपी योजना के अन्तर्गत वित्तीय प्रोन्नयन के रूप में पाँचवें वेतन आयोग द्वारा संतुस्त वेतनमानों की अनुक्रमाणिका / तालिका का अगला वेतनमान थमा दिया गया जबकि संवर्ग के सदस्यों को पदोन्नति क्रम का अगला वेतनमान । इस बात को एक उदाहरण से इस प्रकार समझा जा सकता है कि संवर्ग के सहायक निदेशक (राजभाषा) वेतनमान 6500-200-10500) को एसीपी योजना में वित्तीय प्रोन्नयन के रूप में रू. 10,000-375-15200 का वेतनमान दिया गया जबकि अधीनस्थ कार्यालय के हिन्दी अधिकारी (वेतनमानः6500-200-10500) को रू. 7450-225-11500 का वेतनमान I

अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मी इस अन्याय के विरूद्ध कितनी ही गुहार लगा लें, उनकी कोई नहीं सुनता -न राजभाषा विभाग और नही पीड़ित राजभाषा कर्मियों का प्रशासनिक विभाग / मंत्रालय I केद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (C.A.T.) द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे ही एक प्रकरण में दिए गए निर्णय / आदेश का भी इन बहरें लोगों पर कोई असर नहीं पड़ता क्योंकि अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मियों का कोई संगठन नहीं है जो इस अन्याय के विरूद्ध बार-बार न्यायालय का दरवाजा खटखटाता रहे I

दिल्ली में केद्रीय लोक निर्माण विभाग भारत सरकार का एक अधीनस्थ कार्यालय है और इसके कनिष्ठ अनुवादकों को रू. 1400-2600 के बजाए रू. 1400-2300 का वेतनमान दिया गया था और साथ ही में यह भी हिदायत जारी की गई थी कि यदि गलती से किसी कनिष्ठ हिन्दी अनुवादक को रू. 1400-2600 का वेतनमान देकर उसका वेतन उसमें निर्धारित कर दिया गया हो तो पुनः उस कनिष्ठ हिन्दी अनुवादक का वेतन रू. 1400-2300 में निर्धारित किया जाए और भुगतान किया गया अधिक वेतन वापिस लिया जाए I

सीपीडब्ल्यूडी के अनुवादकों की एसोसिएशन ने OA 1 57 / 90 की पंजीकरण संख्या से केद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) में आवेदन किया कि वापसी संबंधी सरकारी आदेश पर रोक लगे और सीपीडब्ल्यू के कनिष्ठ हिन्दी अनुवादकों क ाट केद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा संवर्ग के कनिष्ठ हिन्दी अनुवादकों के समान रू. 1400-2600 का वेतनमान दिया जाए । माननीय केद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण की मुख्यपीठ ने 10.1.1992 को सीपीडब्ल्यूडी ट्रान्सलेटर्स एसोसिएशन के पक्ष में निर्णय देते हुए के.प्रशा.न्याया. द्वारा 24.9.1991 को वाद सं. ओए 1310 / 89 - (वी.के. शर्मा और अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य) में प्रतिवादियों को आदेश दिया था वह आर्म्ड फोर्सेस हैडक्वार्टर्स (एएफएचक्यू / इन्टरसर्विसेस आर्गेनाइजेशन) रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ और कनिष्ठ हिन्दी अनुवादकों को दिनांक 1.1.1986 से क्रमशः रू. 1600-2600 के स्थान पर रू. 1640-2900 का और रू. 1400-2300 के स्थान पर रू. 1400-2600 का वेतनमान, वेतन निर्धारण के परिणामजन्य सभी लाभ, बकाया राशि, और आनुषगिक भत्ते आदि प्रदान करे I इस प्रकरण में माननीय न्यायाधिकरण ने रणधीर सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, 1982, SCC (L&S) प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के हवाले से बताया कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय का मानना था कि जहां सभी प्रासंगिक विचारणीय बातें समान हैं, अलग विभागों में एक जैसे पदों पर काम करने वाले व्यक्तियों के साथ वेतनादि के मामले में अलग-अलग व्यवहार नहीं करना चाहिए I ( The Tribunal relied upon decision of the Supreme Court in Randhir Singh Vs Union of India, 1982 SCC (L & S) wherein the Supreme Court observed that where all the relevant considerations are the same persons holding identical posts must not be treated differently in the matter of their pay merely because they belong to different departments).

यहाँ भी सीपीडब्ल्यूडी प्रशासन भेदभाव करने से पीछे नहीं रहा और उसने संशोधित वेतनमान ट्रांस्लेटर्स एसोसिएशन के सदस्यों को ही दिए, बाकी को नहीं । ट्रांस्लेटर्स एसोसिएशन ने अदालत की अवमानना का प्रकरण CCP 212 of 1993 दायर किया । इस प्रकरण में भी कैट की प्रिंसिपल बैंच ने ट्रांस्लेटर्स एसोसिएशन के पक्ष में फैसला दिया और एक बहुत महत्वपूर्ण सिद्धांत का प्रतिपादन किया, When a judgement is declaratory in character, it is applicable to all those who fall in that class and that each and every individual should not be compelled to approach the Courts for getting the relief. The Govt. as a model employer must on its own accord similar benefits to everyone similarly situate.

इसके बाद, राजभाषा विभाग ने 8 नवंबर 2000 को का.ज्ञा.सं. 12/2/97-OL(S) के द्वारा, केसचिराभासे के वरिष्ठ हिन्दी अनुवादकों और कनिष्ठ हिन्दी अनुवादकों को स्वीकृत वेतनमान क्रमशः रू. 5500-9000 और रू. 5000-8000 इस सेवा संवर्ग से बाहर के वरिष्ठ हिन्दी अनुवादकों और कनिष्ठ हिन्दी अनुवादकों को भी प्रदान करने का निदेश जारी किया I

मगर अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मियों का दुर्भाग्य केवल यहीं समाप्त नहीं हो गया I एक बार फिर भारत सरकार, वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग ने केवल केद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा संवर्ग के सदस्यें को संशोधित वेतनमान दिए और संवर्ग से बाहर के राजभाषा कर्मियों को यदि किसी ने गलती से ये वेतनमान देभी दिए हों तो संशोधन रद्द करने और, यदि संशोधित वेतनमानों के अनुसार कोई भुगतान किया गया हो तो उसे वापिस लेने का फरमान जारी कर दिया I भारत सरकार के राजभाषा विभाग ने भारत सरकार के ही वित्त एवं कंपनी कार्य मंत्रालय (व्यय विभाग) के यू.ओ सं. 70/11/2000 आई सी दिनांक 13.2.2003 के अन्तर्गत प्राप्त स्वीकृति के अनुसार कार्या.आदे. सं. 13/8/2002 रा.भा.(सेवा) दिनांक 19.2.2003 के माध्यम से (1) कनिष्ठ अनुवादक को रू. 5000-8000 के बदले रू. 5500-9000 का और (2) वरिष्ठ अनुवादक को रू. 5500-9000 के बदले रू. 6500-10500 का वेतनमान प्रदान किया I 27 फरवरी 2003 को जारी एक अन्य कार्यालय आदेश सं. 12/2/97-रा.भा.(सेवा) के माध्यम से सहायक निदेशक (राजभाषा) को रू. 6500-200-10500 के वेतनमान के बदले रू. 7500-250-12000 का वेतनमान प्रदान किया गया I इन आदेशों में यह भी स्पष्ट कहा गया था कि ये वेतनमान केवल केद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा संवर्ग के सदस्यों तक ही सीमित हैं I बाद में, इस संवर्ग के बाहर कार्यरत राजभाषा कर्मियों ने जब इन संशोधित वेतनमानों के लिए आग्रह किया और इस विषय में भारत सरकार के राजभाषा विभाग तथा वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग से संपर्क साधना आरंभ किया तो भारत सरकार, वित्त मंत्रालय, व्यय विभाग ने एक कार्यालय ज्ञापन जारी करके ज़ोर दिया कि फरवरी 2003 में जारी किए गए कार्या.ज्ञाप. के माध्यम से सहायक निदेशक (रा.भा.) वरिष्ठ अनुवादक और कनिष्ठ अनुवादक को प्रदत्त संशोधित वेतन मान केवल केसचिराभासे के सदस्य राजभाषा कर्मियों तक ही सीमित हैं, इसके बाहर अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मियों के लिए नहीं I इतना ही नहीं उस कार्यालय ज्ञापन के हस्ताक्षर कर्त्ता अध्ंिाकारी श्री मनोज जोशी, उप सचिव, व्यय विभाग, वित्त मंत्रालय ने तो उा कार्यालय ज्ञापन में यहां तक कहा है कि यदि गलती से किसी कार्यालय में इनका लाभ दिया गया हो तो वह वापिस ले लिया जाए और लाभार्थियों को संशोधनपूर्व की स्थिति में पहुंचा दिया जाए I वित्त मंत्रालय के इतने वरिष्ठ अधिकारी ने क्या के.प्रशा.न्याया. का निर्णय और उसमें उच्चतम न्यायालय का संदर्भ नहीं पढ़ा होगा?

इसी वित्त मंत्रालय ने के.प्रशा.न्याया. द्वारा ओए 157/90 के मामले में दिनांक 10.1.1992 को दिए निर्णय-आदेश और सीसीपी 212/1993 के मामले में दिनांक 20.10.1993 को दिए गए निर्णय-आदेश का पालन करते हुए भारत सरकार, राजभाषा विभाग को कार्यालय ज्ञापन सं. 12/2/97 -रा.भा. (सेवाएं) दिनांक 8 नवंबर 2000 जारी करने का निदेश दिया जिसके माध्यम से सभी वरि.हि.अनु.को रू. 5500-9000 का और कनि.हि.अनु. को रू. 5000-8000 वेतनमान प्रदान किया गया था I फिर न्यायालय की यह अवमानना क्यूं I

अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मियों ने जब फरवरी 2003 में राजभाषा विभाग द्वारा संशोधित वंतनमानों के लिए अपने-अपने प्रशासनिक मंत्रालयों में मांग की तो उन्हें वित्त मंत्रालय के जवाब के हवाले से बैरंग लौटा दिया गया I उनके प्रति न तो गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग ने सहानुभूति दिखाई और न ही विभिन्न प्रशासनिक मंत्रालयों ने I कोई भी इस संदर्भ में केद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण और उससे पहले सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर ध्यान नहीं दे रहा था I इसका एकमात्र कारण था कि केद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा संवर्ग के समान अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मियों का कोई संवर्ग नहीं था I एक-दो मंत्रालयों में, जहां अधीनस्थ कार्यालय और उनमें काम करने वाले राजभाषा कर्मियों की संख्या पर्याप्त थी, अधीनस्थ कार्यालयों में कार्यरत राजभाषा कर्मियों का अलग संवर्ग बन गया जैसे वित्त मंत्रालय का आयकर विभाग । किन्तु जहां राजभाषा कर्मियों की संख्या 1-1, 2-2 थी, उनका संवर्ग कौन बनाए?

भारत भर में भारत सरकार की राजभाषा नीति के अनुपालन में कितनी और कैसी प्रगति हो रही है तथा कहां-कहां किस-किस सुविधा-उपाय की आवश्यकता है, इस पर नज़र रखने और इसका आकलन करने के लिए एक संसदीय राजभाषा समिति है I इस समिति की रिपोर्ट सीधे-सीधे महामहिम राष्ट्रपति जी को प्रस्तुत की जाती है I इस समिति की रिपोर्ट के प्रथम खंड माननीय राष्ट्रपति जी के आदेश संकल्प सं. 1/20012/1/87-रा.भा. (क-1) दिनांक 30-12-1988 के द्वारा जारी किए गए इस संकल्प की मद सं. 11, ``अधीनस्थ कार्यालयों में अनुवाद संबंधी पदो पर कार्यरत अधिकारियों- कर्मचारियों के अलग-अलग संवर्ग गठित करना'' में निदेश दिया गया है कि विभ्ंिान्न मंत्रालयों / विभागों तथा उपक्रमों को अपने-अपने अधीनस्थ कार्यालयों में संघ की राजभाषा नीति के अनुपालन के लिए अनुवाद संबंधी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए कार्यरत अधिकारियों /कर्मचारियों का भी अलग-अलग संवर्ग गठित करना चाहिए I(इसी में आगे कहा गया कि) जहां संवर्ग का गठन संभव हो, वहां संवर्ग बनाया जाए, जहां पर यह संभव न हो वहां स्टाफ की पदोन्नति के लिए अन्य प्रकार की व्यवस्था की जाए I गृह मंत्रालय का राजभाषा विभाग इस संबंध में अपेक्षित कार्रवाई के लिए आवश्यक निर्देश जारी करे I भारत सरकार के 90% से भी ज्यादा अधीनस्थ कार्यालयों को आज भी राजभाषा विभाग के ऐसे किसी निर्देश का इंतजार है इस विषय में अभी तक न तो कोई व्यावहारिक कदम उठाया गया है और न ही किसी निरीक्षण प्रश्नावली में प्रश्न किया गया है।

अधीनस्थ कार्यालयों में अधिकारियों / कर्मचारियों की अधिकतम अपेक्षित शैक्षणिक योग्यता स्नातक स्तर तक होती है किन्तु एक राजभाषा कर्मी के लिए एम.ए. होना अनिवार्य है I एक कनिष्ठ किन्दी अनुवादक के लिए, जो इस पिरामिड की नींव का पत्थर होता है, बी.ए. स्तर तक हिन्दी, अंग्रेजी का अनिवार्य ज्ञान के साथ-साथ हिन्दी या अंग्रेजी में एम.ए. होना अनिवार्य होता है I किन्तु एक एल.डी.सी. दसवीं पास हो तब भी चलता है I एक डिप्लोमा धारी इंजीनियर सहायक के वेतनमान में नौकरी पाता है I एल.डी.सी., अवर सचिव के पद तक पदोन्नति पा जाता है, डिप्लोमा धारी इंजीनियर, मुख्य अभियंता तक बन जाता है किन्तु अधीनस्थ कार्यालय का एम.ए. पास कनिष्ठ हिन्दी अनुवादक उसी पद पर रिटायर हो जाता है जिस पर भर्ती हुआ था I

कनिष्ठ अनुवादक को नौकरी दी जाती है मानो उस पर बहुत एहसान कर देते हैं I वह हो या उसका हिन्दी अधिकारी, नक्कारखाने में तूती की आवाज की तरह उनकी बातों पर तब तक कोई ध्यान नहीं देता जब तक संसदीय राजभाषा समिति के निरीक्षण जैसा कोई डंडा उनके सिर पर नहीं पड़ता I जहां संसदीय राजभाषा समिति द्वारा निरीक्षण का पत्र मिला वहीं रिकार्ड रूम में धूल फांक रही पुरानी फाइल की तरह राजभाषा कर्मी की तलाश, झाड़ फूंक होती है, उसकी कद्र की जाती है, बाद में उसे फिर रिकार्ड रूम में पें€क दिया जाता है I प्रशासन का जो काम दूसरे कर्मचारी करने से इंकार कर देते हैं, उसके मत्थे मंढ दिया जाता है, और उससे भी यह काम अंग्रेजी में ही करवाना चाहते हैं I हिन्दी अनुवादक एक सहायक स्तर का कर्मचारी होता है, इसलिए उच्चतर अधिकारी उसे कोई भाव नहीं देते I क्योंकि उच्चतर अधिकारियों से उसे अपने कार्य (राजभाषा नीति के अनुपालन) में कोई सहयोग-समर्थन नहीं मिलता, तो दूसरे कर्मचारी भी राजभाषा नीति के अनुपालन के मामले में उदासीनता ही दिखाते हैं I हिन्दी अनुवादक से उम्मीद की जाती है कि वही अनुवाद भी करे और उसको टाइप भी वही करे I अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मियों की यह स्थिति किसी एक या दो कार्यालयों में नहीं बल्कि लगभग शत-प्रतिशत अधीनस्थ कार्यालयों में है I कोई इक्का-दुक्का कार्यालय ही होगा जहां राजभाषा कर्मियों को उचित समर्थन और सहयोग मिलता है, ऐसे में उनके न्यायोचित अधिकारों के लिए उनका समर्थन कौन करेगा I

जब न्यायोचित अधिकारों की बात उठी है तो यहां अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मियों के केद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण में एक और सफल संघर्ष की चर्चा करना उचित होगा I जब वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग की मंजूरी पर भारत सरकार के राजभाषा विभाग ने कं.सचि.रा.भा. से. संवर्ग के सहायक निदेशक (राजभाषा), वरिष्ठ हिन्दी अनुवादकों और कनिष्ठ हिन्दी अनुवादकों को फरवरी 2003 में दि 1.1.1996 से संशोधित वेतनमान प्रदान किए और इस संवर्ग से बाहर के राजभाषा कर्मियों को इनसे निर्ममतापूर्वक वंचित रखा तो अधीनस्थ कार्यालयों के दो हिन्दी अनुवादकों श्री धनंजय सिंह और श्री राजेश कुमार गोंड ने के.प्रशा.न्याया. की कोलकात्ता पीठ में दो याचिकाएं क्रमशः OA 912/04 और OA 939/04 दायर कीं I इनमें से एक श्री राजेश कुमार गोंड ने तो भारत सरकार के राजभाषा विभाग को ही प्रतिवादी बनाया था I इन दोनों प्रार्थियों ने अदालत (CAT) से याचना की थी कि (i) अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मियों को भी दिनांक 1.1.1996 से वही संशोधित वेतनमान दिए जाएं जो राजभ्ंाषा विभाग ने 19/2/2003 और 27 फरवरी 2003 को जारी कार्यालय ज्ञापनों द्वारा के.सचि.रा.भा.से. के वरि. अनुवादकों, कनिष्ठ अनुवादकों और सहायक निदेशक (राजभाषा) को प्रदान किए थे और (ii) दिनांक 29.3.2004 का कार्यालय ज्ञापन रद्द किया जाए I माननीय केद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण ने याचिकाकर्त्ताओं के पक्ष में निर्णय देते हुए दिनांक 09.11.2006 को उपरोक्त दोनों प्रार्थनाएं स्वीकृत कीं I संभवतः, इसी निर्णय को ध्यान में रखते हुए छठे केद्रीय वेतन आयोग ने केद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा संवर्ग के सदस्यों के लिए संशोधित वेतनमानों की सिफारिश करते हुए, यही वेतनमान 1.1.2006 से अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मियों को प्रदान करने की सिफारिश की I इस सिफारिश पर अमल करते हुए भारत सरकार (वित्त मंत्रालय) के व्यय विभाग ने कार्यालय ज्ञापन एफ सं. 1/1/2008-आईसी दिनांक 24 नवंबर 2008 के द्वारा के.सचि.रा.भा.से. संवर्ग के निष्ठ अनुवादक से लेकर निदेशक (रा.भा.) के लिए 1.1.2006 से संशोधित वेतनमान स्वीकृत किए और विभिन्न मंत्रालयों / विभागों को हिदायत दी कि वे ये वेतनमान अधीनस्थ कार्यरत समान पदाधारियों को भी प्रदान करें I नवंबर 2008 से जून 2009 के अंत तक 7 माह बीत चुके हैं, अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मियों तक इन संशोधित वेतनमानों का लाभ नहीं पहुंचा है I वास्तविकता यह है कि केद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा संवर्ग के राजभाषा कर्मियों का पिता-परमपिता तो भारत सरकार, गृह मंत्रालय का राजभाषा विभाग है, वह उनके हितों की अच्छी तरह देखभाल करता है I किन्तु, अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मियों के लाभों के बारे में न तो राजभाषा विभाग कुछ करता है और न ही अधीनस्थ कार्यालयों के प्रशासनिक मंत्रालय या विभाग, क्योंकि उन्हें कोई कष्ट नहीं है I ये प्रशासनिक मंत्रालय या विभाग अपने अधीनस्थ कार्यालयों में राजभाषा नीति अनुपालन की कितनी चिंता करते हैं यह इसी से पता चल जाता है कि इनके द्वारा अपने अधीनस्थ कार्यालयों का वर्ष में कम से कम एक बार किया जाने वाला निरीक्षण 10-10, 20-20 वर्ष तक नहीं होता और यदि होता भी है तो एक रस्म अदायगी से ज्यादा नहीं I

ऐसा नहीं है कि भेदभाव मूलक इस समस्या का समाधान नहीं है I केद्रीय प्रशासनिक न्यायधिकरण ने राजभाषा विभाग के इस भेदभाव मूलक व्यवहार को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन माना है I ये दोनों धाराएं समानता के अधिकार से संबंधित हैं I वेतनमानों में असमानता के मूल में केद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा संवर्ग है I वास्तव में, यह संवर्ग राजभाषा संबंधी पदों के सेवा संबंधी विविध पहलुओं में समानता / समरूपता ओर पदोन्नति के अधिक से अधिक अवसर पैदा करने के लिए गठित किया गया था । किन्तु समय बीतने के साथ केद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा संवर्ग के सदस्यों को अधीनस्थ कार्यालयों के राजभाषा कर्मियों से श्रेष्ठतम समझ उन्हें सेवा संबंधी बेहतर अवसर प्रदान किए गए I अतः इस समस्या के समाधान के लिए केद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा संवर्ग का पुनर्गठन किया जाए I

इसके अन्तर्गत कनिष्ठ अनुवादक, वरिष्ठ अनुवादक और सहायक निदेशक (राजभाषा) के, एक मंत्रालय, उसके विभागों, संबंद्ध और अधीनस्थ कार्यालयों में वर्तमान सभी पदों का उस मंत्रालय के स्तर पर मंत्रालय राजभाषा सेवा संवर्ग बनाया जाए I इस प्रकार एक मंत्रालय में कनिष्ठ अनुवादक को उसी मंत्रालय में सहायक निदेशक (राजभाषा) के पद तक पदोन्नति पाने के अवसर होंगे I जब किसी मंत्रालय का कोई वरिष्ठ अनुवादक सहायक निदेशक (राजभाषा) के पद पर पदोन्नति पाए तो उसकी इस प्रकार पदोन्नति पर नियुक्ति की सूचना (पृष्ठांकन) राजभाषा विभाग को दे दी जाए I

राजभाषा विभाग में केद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा संवर्ग का प्रचालन-नियंत्रण हो I इस संवर्ग में उप-निदेशक (राजभाषा) से लेकर निदेशक (राजभाषा) तक के पद शामिल हो I जैसे ही किसी वरिष्ठ अनुवादक की सहायक निदेशक (राजभाषा) के पद पर पदोन्नति की सूचना राजभाषा विभाग को मिले वह उसे उप-निदेशक (राजभाषा) के पद पर पदोन्नति हेतु सहायक निदेशक (राजभाषा) की वरिष्ठता सूची में शामिल कर ले I यहां हमें एक बात नहीं भूलनी चाहिए कि प्रत्येक मंत्रालय में अराजपत्रित कर्मचारियों का संवर्ग उसी मंत्रालय तक होता है I केद्रीय सचिवालय सेवा के विभिन्न संवर्ग राजपत्रित पदों से विशेषकर "क'' समूह के राजपत्रित पदों से आरंभ होते हैं I इस प्रकार, यदि केद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा संवर्ग का पुनर्गठन होता है तो यह समस्या हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी ।
लक्ष्मण गुप्ता

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

केंद्रीय कर्मचारियों को सरकार ने त्योहारी सीजन का तोहफा दिया है।



सरकार ने छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद एरियर (बकाया राशि) की दूसरी किश्त जारी करने की घोषणा की है। सूत्रों के अनुसार दूसरी किश्त सितंबर में मिलने की संभावना है। इससे सरकारी खजाने पर करीब 17,500 करोड़ रुपये का भार बढ़ेगा। एरियर सितंबर माह की सैलरी में मिलने की उम्मीद है। वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद वेतन बढ़ोतरी को जनवरी 2006 से लागू किया गया था। इस कारण केंद्रीय कर्मचारियों को एरियर का भुगतान किया गया, मगर सरकार ने इसे दो भागों में देने का फैसला किया। नवंबर 2008 में कुल एरियर का 40 पर्सेंट दिया गया था। अब एरियर का बाकी बचा 60 पर्सेंट दिया जाएगा। देश में करीब 38 लाख केंद्रीय कर्मचारी और पेंशनर हैं। इस आंकड़े में सुरक्षाबल शामिल नहीं हैं, वे भी केंद्र सरकार के आधीन आते हैं। वित्त मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार केंद्रीय कर्मचारियों को एरियर राशि जारी कर दी गई है। अब इसका ज्ञापन सभी केंद्रीय सरकारी मंत्रालयों और विभागों में भेजा जाएगा। इसके बाद मंत्रालय और विभाग अपने कर्मचारियों और अधिकारियों की बकाया राशि का आकलन करने के बाद इसे देंगे। ऐसे में एरियर सितंबर माह की सैलरी में ही संभव हो पाएगा। ज्ञापन में कहा गया है कि जिन कर्मचारियों ने 1 जनवरी 2004 के बाद से नौकरी जॉइन की है, उनको दूसरी किश्त तभी मिलेगी, जब वे नई पेंशन स्कीम लेंगे। सरकारी कर्मचारियों को पहले की तरह अपने एरियर की दूसरी किश्त को भी साधारण भविष्य निधि (जीपीएफ) में जमा करने की भी छूट रहेगी।

सोमवार, 17 अगस्त 2009

पार्टी के सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी के नक्शे कदम पर चलते हुए भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) के सीनियर नेता जसवंत सिंह ने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना को एक 'महान भारतीय' करार दिया है। एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में पूर्व विदेश मंत्री सिंह ने बंटवारे के लिए देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया है। इंटरव्यू में सिंह ने कहा कि नेहरू बहुत हद तक केंद्रीकृत नीति में विश्वास करते थे और यही चीज वह देश में लागू करना चाहते थे। जिन्ना एक संघीय नीति चाहते थे, जिसे गांधी भी स्वीकार करते थे। जबकि नेहरू इससे सहमत नहीं थे। नेहरू 1947 तक संघीय भारत के रास्ते में खड़ा रहे। जसवंत ने बंटवारे के लिए जिन्ना को जिम्मेदार मानने की धारणा को खारिज करते हुए कहा कि यह गलत धारणा है और इसे सुधारने की जरूरत है। सिंह ने कहा कि मैं सोचता हूं कि हमने उन्हें गलत समझा क्योंकि हमें एक भय खड़ा करने की जरूरत थी। हमें एक भय की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि इस उपमहाद्वीप की 20वीं शताब्दी की सबसे बड़ी घटना देश का बंटवारा था। जसंवत सिंह द्वारा जिन्ना पर लिखी गई पुस्तक सोमवार को रिलीज होगी। उन्होंने कहा कि वह पाकिस्तानी नेता के व्यक्तित्व से प्रभावित हैं। सिंह ने यह भी सवाल उठाया कि क्यों देशवासी जिन्ना को एक महान भारतीय करार नहीं देते। इस बारे में जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि जिन्ना ने काफी कुछ ऐसा किया जो सही मायने में काफी महत्वपूर्ण था। गांधी ने स्वयं जिन्ना को महान भारतीय करार दिया है। इसे हम क्यों नहीं याद रखते हैं। हम यह क्यों नहीं सोचते कि गांधी ने उन्हें ऐसा क्यों कहा।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

प्रेमचन्द की धनिया अभी भी जिन्दा

प्रेमचंद की धनिया करीब 75 साल बाद गोदान (उपन्यास) से निकलकर रायबरेली के अघौरा गांव में खड़ी है। उन्हीं विद्रोही तेवरों के साथ। इस बार उसका नाम विद्यावती पासी है। धनिया के पति होरी की तरह विद्यावती का घरवाला देसराज भी कर्ज में डूबा अपने मुकद्दर को कोसता है, लेकिन अनपढ़ विद्यावती व्यवस्था को चुनौती देती हुई पूछती है कि जब मकान वालों को कॉलोनी (इंदिरा आवास योजना में पक्का मकान) दे दी गई तो हम बिना छत और दीवारों वाले गरीबों को क्यों नहीं? पिछले साल की बारिश में ढह गए अपने एक कच्चे कमरे के घर को दिखाने के लिए ही विद्यावती अचानक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का हाथ पकड़कर उन्हें घर के अंदर ले तो गई थी, मगर बिठाने के लिए उसके पास चारपाई तक नहीं थी। दलितों के गांव वैसे ही हैं। प्रेमचंद बदलाव की कहानियां लिख रहे थे। मगर गरीब के घर नहीं बदले। यह सारे घर रायबरेली के आसपास के इलाकों- प्रतापगढ़ और बनारस के गांवों में ही प्रेमचंद ने देखे थे। सोनिया अपने संसदीय क्षेत्र के विकास पर बहुत ध्यान देती हैं। इस बार काफी सख्त भी दिखीं। मगर व्यवस्था को चलाने वाले भी कम कलाकार नहीं हैं। दौरे के आखिरी दिन बुधवार को सोनिया की गाड़ी के गुजरने के साथ ही आवाज आती है- मैडम गईं, काम बंद कर दो। यह तल्ख सचाई यूपीए की सबसे महत्वाकांक्षी स्कीम ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा )की है। विडंबना यह है कि सरेआम आंखों में धूल झोंकने का यह कारनामा सोनिया के संसदीय क्षेत्र में किया जा रहा है। देश के सबसे हाई प्रोफाइल संसदीय क्षेत्र रायबरेली में नरेगा के कामों में बेशुमार शिकायतें हैं। एक और मिसाल देखिए। सोनिया गांव बदई पुरवा में नरेगा के अंतर्गत सड़क निर्माण का काम देखने गईं। मौके पर कोई मस्टर रोल नहीं थी। कितने लोगों को यहां काम मिला है? अभी कितने ग्रामीण काम कर रहे हैं? पैसा कब से नहीं मिला? जैसे सवालों का ग्राम प्रधान और बीडीओ के पास कोई संतोषजनक जवाब नहीं था। सोनिया ने जब वहां खुद खड़े होकर हाजिरी लगवाई तो प्रधान ने सच स्वीकार करते हुए कहा- मैडम जब आप आती हैं तो हमारे गर्दन पर तलवार रख दी जाती है। कहा जाता है कि काम शुरू करवाओ। अब जल्दी और घबराहट में गलतियां होती हैं। हमें माफ कर दो। नरेगा का काम राज्य सरकार के अधिकारी करवाते हैं। गांव के सरपंच कहते हैं कि उन्हें नरेगा का काम तभी मिलता है, जब पहले जिला अधिकारियों को उनका कमिशन मिल जाता है। यह पैसा कहां से दिया जाए? गांव के लोग बताते हैं कि नरेगा में काम दस को मिलता है, मस्टर रोल में नाम लिखे जाते हैं पचास। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी भी अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी में नरेगा के कामों को लेकर सार्वजनिक रूप से गुस्सा दिखा चुके हैं। एक अधिकारी ने जब गांववालों को गलत करार देने की कोशिश की थी, तब राहुल ने डांटते हुए कहा था कि लोग गलत नहीं बोलते।

शनिवार, 8 अगस्त 2009

गीतकार गुलशन बावरा का शुक्रवार को दिल का दौरा पड़ने के बाद निधन

'मेरे देश की धरती....' जैसे लोकप्रिय गीतों के रचयिता और जाने माने गीतकार गुलशन बावरा का शुक्रवार को दिल का दौरा पड़ने के बाद निधन हो गया। बाबरा की पड़ोसी मोनिका खन्ना ने बताया- उनकी तबियत कई महीनों से ठीक नहीं थी। शुक्रवार सुबह उन्हें बांद्रा स्थित उनके निवास पर दिल का दौरा पड़ा। उनके परिवार वाले दिल्ली में रहते हैं, जिन्हें सूचना दे दी गई है और वे मुंबई के लिए निकल चुके हैं। उन्होंने कहा कि गुलशन बावरा की इच्छा थी कि उनकी देह को दान किया जाए इसलिए अंतिमसंस्कार नहीं होगा। उनकी देह को जेजे अस्पताल ले जाया जाएगा। वर्तमान पाकिस्तान में जन्मे गुलशन बावरा विभाजन के बाद भारत आ गए थे। अपने 42 सालों के फिल्मी सफर में उन्होंने- 'यारी है ईमान मेरा, यार मेरी जिंदगी', 'तेरी कसम', तुम न होते रहेंगी बहारें और जीवन के हर मोड़ पर मिल जाएंगे हमसफर जैसे यादगार गीत लिखे। यारी है ईमान मेरा, यार मेरी जिंदगी... गाने के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था। गुलशन के परिवार में उनकी पत्नी हैं।